सऊदी अरब इस समय हूती विद्रोहियों के लगातार हमलों से काफी परेशान है. ऐसे संकट के बीच अमेरिका ने सऊदी को अकेला भी छोड़ दिया और फिर करीब 2.05 लाख करोड़ रुपए की F-35 फाइटर जेट डील भी पक्की कर ली. अमेरिका इस डील से मोटा मुनाफा कमा रहा है और चीन-रूस को मिडिल ईस्ट के बाजार से दूर रखना चाहता है. हालांकि, इन महंगे जेट्स को सऊदी पहुंचने में अभी 3 से 5 साल लगेंगे. वहीं पहाड़ों में छिपकर छापामार जंग लड़ने वाले हूती लड़ाकों के आगे सऊदी के ये महंगे हथियार कितने कारगर होंगे, इस पर भी सवाल बने हुए हैं.
सऊदी अरब इस वक्त सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा है. हूती लड़ाकों ने एक बार फिर से सऊदी को दहलाना शुरू कर दिया है. उनका आतंक लाल सागर से लेकर मक्का तक पहुंच चुका है. इस मुसीबत से निपटने के लिए सऊदी, पाकिस्तान से लेकर अमेरिका तक मदद मांग चुका है. पाकिस्तान मक्का समझौते से पीछे हट चुका है और डोनाल्ड ट्रंप ने एमबीएस के मुंह पर मदद करने से साफ मना कर दिया है. इन हालातों में भी अमेरिका ने बड़ा खेल कर दिया है और करोड़ों डॉलर कमाने का रास्ता निकाल लिया है. अमेरिका ने सऊदी को F-35 फाइटर जेट्स की ‘अफीम’ चटाकर करीब 2 लाख करोड़ रुपए की डील कर ली है.
अमेरिका ने सऊदी के साथ कैसे किया खेल
अमेरिका ने पहले यमन के हूती विद्रोहियों के साथ सीक्रेट डील करके सऊदी अरब को युद्ध के मैदान में अकेला छोड़ा, और अब उसी सऊदी अरब को दुनिया के सबसे एडवांस F-35 फाइटर जेट्स बेचने का नया दांव चल दिया है. अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने सऊदी अरब को 48 F-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान बेचने की डील को हरी झंडी दे दी है.
ये पूरी डील करीब 24.3 बिलियन डॉलर यानी लगभग 2.05 लाख करोड़ रुपए की है. एक तरफ सऊदी अरब चारों तरफ से हमलों से घिरता जा रहा है, वहीं अमेरिका हथियारों का ये तगड़ा चस्का चटाकर उससे 2 लाख करोड़ रुपये ऐंठने की तैयारी में है. अमेरिका ने दावा किया है कि 5th जनरेशन के इन खतरनाक लड़ाकू विमानों की एंट्री से पूरे अरब वर्ल्ड का पावर गेम बदलने वाला है.
2.05 लाख करोड़ की मेगा डील: सऊदी को क्या-क्या मिल रहा है?
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुई इस डिफेंस डील की बारीकियों पर नजर डालें, तो ये सिर्फ लड़ाकू विमान खरीदने तक सीमित नहीं है. ये सऊदी वायुसेना को पूरी तरह से बदलने का एक बहुत बड़ा पैकेज है:
- 48 F-35 लड़ाकू विमान: सऊदी अरब को अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन कंपनी के बनाए 48 F-35 ‘लाइटनिंग II’ फाइटर जेट दिए जाएंगे. ये विमान अपनी ‘स्टील्थ’ ताकत के लिए जाने जाते हैं, यानी दुश्मन के रडार इन्हें पकड़ नहीं पाते.
- 49 प्रैट एंड व्हिटनी इंजन: विमानों के साथ 49 बेहद ताकतवर प्रैट एंड व्हिटनी इंजन भी दिए जाएंगे. इनमें से 48 इंजन जेट्स में लगेंगे और 1 इंजन स्पेयर रखा जाएगा.
- हाई-टेक सिक्योरिटी सिस्टम: इस पैकेज में एडवांस कम्यूनिकेशन सिस्टम, आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर टूल्स और जरूरी स्पेयर पार्ट्स भी शामिल हैं.
- खास ट्रेनिंग और मेंटेनेंस: अमेरिकी एक्सपर्ट्स सऊदी अरब के पायलटों को F-35 उड़ाने की स्पेशल ट्रेनिंग देंगे. इसके साथ ही लंबे समय तक इन विमानों की देखभाल का सपोर्ट भी अमेरिका ही देगा.
मिडिल ईस्ट की जंग और सऊदी अरब की मजबूरी
ये फैसला ऐसे समय में आया है जब पूरा पश्चिम एशिया बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है. यमन के हूती विद्रोही लगातार सऊदी अरब के सैन्य ठिकानों और तेल रिफाइनरियों पर ड्रोन और मिसाइल से हमले कर रहे हैं. दूसरी तरफ, ईरान ने होर्मुज में हाहाकार मचा रखा है.
सऊदी अरब लंबे समय से अपने हवाई बेड़े को मॉडर्न बनाने की मांग कर रहा था. सऊदी वायुसेना के पास अभी F-15 और टाइफून जैसे फाइटर जेट्स हैं. ये विमान बेहतरीन तो हैं, लेकिन 5th जनरेशन के F-35 के सामने हल्के पड़ते हैं. दुश्मन के एयर डिफेंस को चकमा देकर सटीक हमला करने के लिए सऊदी को ऐसे फाइटर जेट्स की सख्त जरूरत थी जिन्हें रडार न पकड़ सके. F-35 मिलने के बाद सऊदी की हवाई ताकत कई गुना बढ़ जाएगी.
अमेरिकी डिफेंस मार्केट और ट्रंप प्रशासन का असली खेल
इस 2.05 लाख करोड़ रुपए की मेगा डील के पीछे सिर्फ सऊदी की डिफेंस जरूरतें नहीं हैं, बल्कि इसमें अमेरिका के लालच भी छुपे हुए हैं.
- रक्षा कंपनियों की भारी कमाई: अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन और इंजन बनाने वाली कंपनी प्रैट एंड व्हिटनी के लिए ये 24.3 बिलियन डॉलर का ऑर्डर बहुत बड़ी जीत है. इससे अमेरिका में डिफेंस सेक्टर की हजारों नौकरियों को सुरक्षा मिलेगी.
- हथियारों का बड़ा मार्केट: अमेरिका की हमेशा से यही चाल रही है कि वो मिडिल ईस्ट के अमीर तेल प्रोड्यूसर देशों को अपनी सुरक्षा के लिए वाशिंगटन पर निर्भर रखे. सऊदी अरब दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार देश है, इसलिए अमेरिका उसे किसी कीमत पर हाथ से नहीं जाने देना चाहता.
- चीन और रूस का रास्ता बंद करना: अगर अमेरिका सऊदी को F-35 देने से मना करता, तो सऊदी अरब तुरंत रूस के Su-57 या चीन के J-31 फाइटर जेट्स खरीदने की तरफ कदम बढ़ा लेता. अमेरिका मिडिल ईस्ट के बाजार में चीन या रूस का दबदबा बिल्कुल नहीं बनने देना चाहता.
डील के रास्ते में अभी क्या-क्या हैं रुकावटें?
अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने इस बिक्री को मंजूरी दे दी है, फिर भी इन जेट्स को सऊदी पहुंचने में अभी समय लगेगा.
- अमेरिकी संसद की मंजूरी: इस डील को अब अमेरिकी संसद के सामने रखा जाएगा. वहां कुछ सांसद मानवाधिकारों या इजरायल की सुरक्षा का मुद्दा उठाकर सवाल खड़े कर सकते हैं.
- डिलीवरी में लगेगा वक्त: अगर संसद से मंजूरी मिल भी जाती है, तब भी 48 F-35 जेट्स को बनाने और सऊदी अरब तक पहुंचाने में 3 से 5 साल का समय लग जाएगा.
- कड़ी पायलट ट्रेनिंग: F-35 को उड़ाना बेहद जटिल काम है. सऊदी पायलटों को इसके हाई-टेक कॉकपिट, स्टील्थ तकनीक और मॉडर्न रडार सिस्टम को समझने के लिए महीनों कड़ी ट्रेनिंग लेनी होगी.
हूतियों से लड़ने के लिए काफी नहीं हाईटेक हथियार
सऊदी, अमेरिका से बड़ी-बड़ी हथियार डील कर तो रहा है लेकिन हूती लड़ाकों का सामना इन हथियारों से नहीं किया जा सकता है. सऊदी अरब के पास अरबों डॉलर के महंगे और हाई-टेक हथियार मौजूद हैं, लेकिन ये सब आमने-सामने की जंग लड़ने के लिए बने हैं. दूसरी तरफ, यमन के हूती विद्रोही पथरीले पहाड़ों की आड़ में ‘गोरिल्ला वॉर’ यानी छापामार जंग लड़ते हैं.
हूती लड़ाके कभी भी सेना की तरह खुलकर सामने नहीं आते, बल्कि ‘हिट एंड रन’ का पैंतरा अपनाकर अचानक हमला करते हैं और तुरंत छिप जाते हैं. वो बेहद सस्ते ड्रोन, रॉकेट और बारूदी सुरंगों का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में सऊदी अरब का करोड़ों का फाइटर जेट या भारी-भरकम टैंक हूतियों के इस तरीके के आगे बेबस नजर आता है. छिपे हुए लड़ाकों को ढूंढना और एक सस्ते ड्रोन को गिराने के लिए लाखों की मिसाइल दागना सऊदी अरब को फौजी और आर्थिक दोनों मोर्चों पर भारी पड़ रहा है.
