कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिए कुर्सी छोड़ने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है. शीर्ष अदालत ने एक अहम जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है. याचिका में पुरजोर मांग की गई है कि संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन पर कार्रवाई से बचने के लिए इस्तीफा देने वाले किसी भी पूर्व पदाधिकारी को मिलने वाली पेंशन, सुरक्षा और अन्य सरकारी सुख-सुविधाओं पर पूरी तरह पाबंदी लगाई जाए.
नई दिल्ली
संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा देने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सवाल उठाया है. शीर्ष अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है. याचिका में मांग की गई है कि ऐसे संवैधानिक पदाधिकारियों को किसी भी तरह की सुविधा या लाभ नहीं दिया जाना चाहिए, जो हटाए जाने से बचने के लिए अपनी कुर्सी से इस्तीफा दे देते हैं. CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस जनहित याचिका पर केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा है.
याचिका में कहा गया है कि यदि कोई संवैधानिक पद पर तैनात अधिकारी या पदाधिकारी अपने खिलाफ हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद या ऐसी प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा देता है, तो उसे बाद में किसी भी प्रकार की सुविधा या लाभ नहीं मिलना चाहिए. याचिकाकर्ता ने ऐसे प्रावधानों और नियमों को भी चुनौती दी है, जिनके तहत इस्तीफा देने वाले ऐसे व्यक्ति को किसी तरह की सुविधा या लाभ मिल सकता है. याचिका में दावा किया गया है कि इस तरह का कोई भी नियम संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है.
हटाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद इस्तीफा देने वालों पर रोक की मांग
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे ऐसे संवैधानिक पदाधिकारियों को कोई सुविधा या लाभ न दें, जिन्होंने हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद या फिर ऐसी प्रक्रिया शुरू होने से बचने के लिए अपने पद से इस्तीफा दिया हो. याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा देने के बाद भी सुविधाएं या लाभ मिलना उस व्यवस्था के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है.
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से संबंधित अधिकारियों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे ऐसे संवैधानिक पदाधिकारियों को कोई सुविधा या लाभ न दें, जिन्होंने हटाए जाने की प्रक्रिया शुरू होने के बाद या फिर ऐसी प्रक्रिया शुरू होने से बचने के लिए अपने पद से इस्तीफा दिया हो. याचिकाकर्ता का तर्क है कि किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाए जाने की प्रक्रिया से बचने के लिए इस्तीफा देने के बाद भी सुविधाएं या लाभ मिलना उस व्यवस्था के उद्देश्य को कमजोर कर सकता है.
इसी मुद्दे को लेकर अदालत से स्पष्ट दिशा-निर्देश देने की मांग की गई है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को नोटिस जारी कर इस मामले में उनका पक्ष मांगा है. अब इस याचिका पर आगे की सुनवाई में अदालत संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर मामले पर विचार करेगी.
ये संवैधानिक पद हैं: 1. भारत के राष्ट्रपति, 2. भारत के उपराष्ट्रपति, 3. राज्य के राज्यपाल, 4. प्रधानमंत्री / मंत्रिपरिषद (केंद्र), 5. मुख्यमंत्री / मंत्रिपरिषद (राज्य), 6. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, 7. हाई कोर्ट के न्यायाधीश, 8. भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG), 9. मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC), 10. भारत के महान्यायवादी (Attorney General) और 11. राज्य के महाधिवक्ता (Advocate
याचिका में कहा गया है कि जब किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को एक निश्चित कार्यकाल के लिए चुना या नियुक्त किया जाता है, तो यह उनका संवैधानिक दायित्व है कि वे अपना कार्यकाल पूरा करें और भारत के संविधान के अनुसार उस चुनाव या नियुक्ति से जुड़े संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करें. याचिकाकर्ता का कहना है कि उच्च संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों पर एक अलिखित संवैधानिक दायित्व होता है कि वे या तो अपना कार्यकाल पूरा करें या फिर पद से हटाए जाने की पारदर्शी प्रक्रिया का सामना करें. पद से हटाए जाने से बचने के लिए इस्तीफा देने का आसान विकल्प न तो सोचा गया है और न ही यह उचित है. इस तरह के इस्तीफे उस भरोसे को तोड़ते हैं जो संविधान उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों पर जताता है.
याचिका में यह भी कहा गया कि पद से हटाए जाने की पारदर्शी प्रक्रिया से बचने के लिए इस तरह के इस्तीफे इसलिए दिए जाते हैं क्योंकि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि इस्तीफा देने के बाद भी उन्हें वे सभी सुविधाएं और लाभ मिलते रहेंगे जो कार्यकाल पूरा करने पर मिलते. कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देने के बावजूद सुविधाएं और लाभ मिलते रहने के ये प्रावधान ही कार्यकाल के बीच में ऐसे असंवैधानिक और सिद्धांतहीन इस्तीफे दिए जाने की मुख्य वजह हैं, जिसके परिणामस्वरूप संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को जीवन भर अनुचित लाभ मिलता रहता है.
याचिका में कहा गया, “ऐसे इस्तीफे के बाद भी संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को यकीन होता है कि उन्हें अपने पद से जुड़ी सुविधाएं और लाभ मिलते रहेंगे. ऐसी प्रथा संवैधानिक भावना के खिलाफ है और सीधे तौर पर ‘कानून के शासन’ (Rule of Law) के विपरीत है, जो भारत के संविधान का मूल ढांचा है. यदि कोई संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति अपने संवैधानिक रूप से निर्धारित कार्यकाल के बीच में इस्तीफा देता है, तो उसे किसी भी तरह की सुविधा या लाभ का हकदार नहीं होना चाहिए.”
