अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना रही है, लेकिन लंबी लड़ाइयों ने उसे एक सबक भी दिया है-हर मोर्चा खुद लड़ना जरूरी नहीं. इंडो-पैसिफिक में चीन के बढ़ते प्रभाव और ताइवान संकट के बीच वॉशिंगटन अब नई रणनीति पर काम कर रहा है. वह खुद फ्रंटलाइन से थोड़ा पीछे हटकर जापान को फेस बना रहा है. सवाल यह है कि क्या एशिया में एक नया QUAD आकार ले रहा है और क्या इसकी कमान अब टोक्यो के हाथ में होगी?
ताकत का घमंड मसल दिए जाने से ही चूर होता है. बिना हार-जीत वाली लड़ाई खींचने से नहीं. जहां वार लंबा हुआ, ताकतवर को लगता है जीत हमारी होगी. वो गलतफहमी भी पाल सकता है. यही अमेरिका के साथ होता आया है. वियतनाम में घुसे राष्ट्रपति आइजनहावर. 1953 में. और निकले रिचर्ड निक्सन. 1973 में पेरिस डील के साथ. इस बीच जॉन एफ केनेडी, लिंडन जॉनसन लड़ते रहे. इसी गुमान में कि यूएस आर्मी को नॉर्थ कोरियन गुरिल्ला क्या हरा पाएंगे? रिजल्ट उलटा निकला. गेराल्ड आर फोर्ड 1975 में वाइट हाउस में बैठ कर साउथ वियतनाम का पतन देखते रहे जिसकी मदद के लिए अमेरिकी मिलिट्री एडवाइजर्स का पहला जत्था 1953 में निकला था. फिर अफगानिस्तान में तालिबान जैसी मिलिशिया से जॉर्ज बुश और बराक ओबामा 17 साल तक लड़ते रहे. जो बाइडन को लगा कि ये लड़ाई पैसे की बर्बादी और सैनिकों की हत्या के अलावा कुछ नहीं तो आर्मी वापस बुला ली. यही हाल डोनाल्ड ट्रंप का है. ईरान में कूदे कैसे थे या नेतन्याहू ने कुदाया कैसे था, ये सब हमने देखा. आज बड़े बेआबरू होकर डील खोज रहे हैं. एआई से बना वीडियो पोस्ट कर रहे हैं जिसमें ईरान रिवोल्यूशनरी आर्मी के जहाज समंदर की सतह पर हैं. उधर अमेरिकी मीडिया अरबों डॉलर के नुकसान, महंगाई से त्राहिमाम और एफ-35 जैसे अभेद्द फाइटर जेट्स के उड़ाए जाने का दावा कर रही है.
जब ऐसा होने लगा तो ट्रंप को भी अक्ल आ गई. ताइवान के चक्कर में चीन से उलझ गए तो क्या होगा. अमेरिका ने छोटे-छोटे देशों में मात खाई है. चीन तो सुपरपावर है. फिर क्या, चीन की ताकत के आगे ट्रंप ने सिर झुका दिया. बीजिंग में शी जिनपिंग से मिलते ही नरम पड़ गए. ताइवान के लिए कुछ भी करेगा वाला टोन खत्म हो गया. अब साउथ चाइना सी और हिंद महासागर में चीन की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स वाली रणनीति का मुकाबला कौन करेगा. एशियाई देशों ने ट्रंप की हील हवाई को भाप लिया है. सबसे पहले चीन के पुराने दुश्मन जापान ने रक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भरता को खत्म करने का फैसला किया. नए पीएम सनाए तकाइची ने वर्ल्ड वॉर – 2 से पहले की तरह जापान को एक मॉर्डन मिलिट्री स्टेट बनाने का फैसला किया है. जापान की टेक्नोलॉजी तो आप जानते हैं. एक बार जंग के इरादे से गोला बारूद, फाइटर जेट्स, वॉरशिप बनाने लगे तो दुनिया तो किसी देश से कमतर औजार नहीं साबित होगा.
जापान भी एक कदम आगे…
और जापान ने इस दिशा में कदम बढ़ा दिया है. यही नहीं, चीन के निशाने पर रहे दूसरे एशियाई देशों को भी हथियार एक्सपोर्ट करने का फैसला किया है. क्वाड से उसका भरोसा उठ गया लगता है. अब एशिया-प्रशांत में नया क्वाड आकार ले रहा है. इसमें जापान, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड शामिल हैं. इस खबर से चीन हैरान – परेशान है. अमेरिका नए क्वाड को पीछे से सपोर्ट करेगा.
अब देखिए नए क्वाड के चार देशों के साथ अमेरिका क्या डील कर रहा है.
- न्यूजीलैंड – अमेरिका ने 5 जून को ही घातक Seahawk हेलिकॉप्टर न्यूजीलैंड को बेचने का फैसला किया है. ये डील 1.5 अरब डॉलर की है. ये मल्टी मिशन हेलिकॉप्टर है जो जासूसी के काम आ सकता है, पनडुब्बियों पर वार कर सकता है. इसके अलावा राहत और सहायता पहुंचाने में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है. उधर न्यूजीलैंड इंडो पैसिफिक में पैठ बढ़ाने के लिए रक्षा बजट बढ़ा रहा है.
- जापान – 1960 में अमेरिका और जापान ने Treaty of Mutual Cooperation and Security पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत जापान की भौगोलिक सीमा में उसे किसी तरह का खतरा पैदा होता है तो अमेरिका सैनिक हस्तक्षेप करेगा. इसके साथ-साथ जापान की रक्षा योजनाओं को अमेरिका मदद देता रहेगा. लिहाजा, चीन से सीधे उलझने के बजाए ट्रंप जापान को पुश करेंगे.
- ऑस्ट्रेलिया – फ्रांस से परमाणु पनडुब्बी का करार तोड़ कर अमेरिका और ब्रिटेन के साथ नया समझौता 2021 में हुआ जिसे AUKUS कहते हैं. इसके तहत ऑस्ट्रेलिया को परमाणु पनडुब्बी सप्लाई की जाएगी. चीन इस समझौते की कड़ी आलोचना कर चुका है.इसके अलावा रीयल टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग के लिए Eye-5 समझौता है. इसमें अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन शामिल हैं.
- फिलीपींस – एशिया पैसिफिक में अमेरिका का सबसे पुराना पार्टनर है फिलीपींस. दोनों देशों ने 1951 में Mutual Defence Treaty पर हस्ताक्षर किए. इसके तहत फिलीपींस पर हमला होने की स्थिति में अमेरिका को सैन्य हस्तक्षेप करना पड़ेगा. इसके अलावा 2014 के समझौते के तहत फिलीपींस ने अपने कई गुप्त जगहों पर अमेरिका को मिलिट्री बेस बनाने की इजाजत दी है.
चीन को चेतावनी क्यों?
अब जापान क्या कर रहा है. ये समझिए. पहले तो उसने चीन को सीधी चेतावनी जारी की ताइवान को लेकर. जापान का मानना है कि ताइवान के इर्द-गिर्द की अस्थिरता जापान की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा है. सेंकाकु आइलैंड को लेकर दोनों देशों में विवाद पहले से है. इन सबके मद्देनजर जापान ने फिलीपींस को Abukuma क्लास डिस्ट्रॉयर देने का फैसला किया है. जापान का सबसे मॉर्डन स्टील्थ फ्रिगेट है Mogami Class Frigate. इसे मित्सुबिशी ने बनाया है. बेहद कम सेलर के साथ ये ऑटोमेटेड मोड में दुश्मनों से खुद बचाती हुई पलटवार करती है. ऑस्ट्रेलिया ने 11 फ्रिगेट के ऑर्डर दे दिए हैं और न्यूजीलैंड कतार में है.
इससे आप समझ सकते हैं कि इंडो पैसिफिक और साउथ चाइना सी में स्ट्रैटेजिक डिजाइन किस तरह तेजी से बदल रहा है. अमेरिका सोची समझी चाल के तहत खुद को पीछे कर रहा है. जापान को आगे कर रहा है.
