आरोपी को कानूनी सहायता महज एक रस्म नहीं, बल्कि एक सार्थक प्रक्रिया होनी चाहिए’: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट ने अपराध के आरोपियों की दी जाने वाली कानूनी सहायता पर अहम टिप्पणी की है।अदालत ने कहा कि किसी आरोपी व्यक्ति को दी जाने वाली कानूनी सहायता महज एक रस्म या दिखावटी औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह एक ठोस और सार्थक प्रक्रिया होनी चाहिए। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एससी शर्मा की पीठ ने नंदकिशोर मिश्रा (74) की दायर याचिका पर दिए फैसले में यह टिप्पणी की। मिश्रा को निचली अदालत ने हत्या के अपराध के लिए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

 नई दिल्ली

 

एमिकस क्यूरी को भूमिका पर सवाल
पीठ ने पाया कि आरोपी मध्य प्रदेश के एक सुधार गृह में बंद है। यह देखते हुए कि उसकी दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ अपील की सुनवाई के दौरान उसकी ओर से कोई भी पेश नहीं हुआ, हाईकोर्ट ने कोर्ट की सहायता करने और आरोपी का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक एमिकस क्यूरी (अदालत का सहायक वकील) नियुक्त किया। इसमें यह बात नोट की गई कि एमिकस क्यूरी की नियुक्ति 20 नवंबर, 2025 को हुई थी और हाईकोर्ट ने 26 नवंबर, 2025 को इस मामले का निपटारा कर दिया। इस दौरान न तो आरोपी को कोई नोटिस जारी कर उसे अपील की सुनवाई के बारे में सूचित किया गया और न ही एमिकस क्यूरी उससे मिले।

 

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बिना किसी और देरी के न्याय देने तथा अपील पर तेजी से निर्णय करने की जल्दबाजी में अपीलकर्ता (मिश्रा) को यह बताने की कोशिश नहीं की कि उनकी ओर से कोई प्रतिनिधि न होने पर, उनकी पैरवी के लिए एक एमिकस क्यूरी (अदालत का सहायक वकील) नियुक्त किया गया है। इसके अलावा, ऐसा भी प्रतीत नहीं होता कि एमिकस क्यूरी को अपीलकर्ता से बातचीत करने का कोई अवसर मिला हो। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट पर अपीलकर्ता को उनके वकील की अनुपस्थिति के बारे में सूचित करने की कोई बाध्यता नहीं थी। फिर भी, यदि अपीलकर्ता को इस बारे में सूचित कर दिया गया होता तो यह एक समझदारी भरा और वांछनीय कदम होता।

 

‘कानूनी सहायता केवल एक रस्म या नाममात्र की औपचारिकता नहीं होनी चाहिए’
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस बात का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि इस अदालत का यह लगातार मत रहा है कि किसी आरोपी व्यक्ति को दी जाने वाली कानूनी सहायता केवल एक रस्म या नाममात्र की औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह एक ठोस और सार्थक प्रक्रिया होनी चाहिए, जो वकील की प्रभावी सहायता सुनिश्चित करे। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का यह नेक इरादा तो बिल्कुल स्पष्ट है कि उसने एक आरोपी का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक एमिकस क्यूरी नियुक्त किया, क्योंकि उसका अपना वकील उसकी अपील पर बहस करने के लिए मौजूद नहीं था और ऐसा कर हाईकोर्ट का मकसद न्याय को बढ़ावा देना ही था। लेकिन, शायद न्याय के उद्देश्य की और भी बेहतर ढंग से पूर्ति तब होती, जब अपीलकर्ता को एक औपचारिक नोटिस जारी कर उसे सुनवाई के बारे में और उसके प्रतिनिधित्व के लिए की गई व्यवस्था के बारे में सूचित किया गया होता। पीठ ने कहा कि ऐसा कदम तब और भी अधिक जरूरी हो जाता है, जब मौजूदा मामले की तरह अपीलकर्ता अपील के लंबित रहने के दौरान जेल में रहा हो। पीठ ने हाईकोर्ट को याचिकाकर्ता की अपील पर नए सिरे से सुनवाई का आदेश दिया।