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हम आंखें नहीं मूंद सकते, SIR पर सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस, ECI के वकील डीएस नायडू को जस्टिस बागची ने घेरा

चुनाव आयोग के सीनियर एडवोकेट डीएस नायडू ने सुप्रीम कोर्ट में अपना बचाव करने की भारी कोशिश की. उन्होंने कहा कि लोगों को साबित करना होगा कि वे 2002 की लिस्ट में थे. इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि आप अपनी दलीलों में सुधार कर रहे हैं. कोर्ट ने माना कि न्यायिक अधिकारियों से भी काम में कुछ गलती हुई होगी. एक दिन में 1000 डाक्यूमेंट देखने पर 70 प्रतिशत एक्यूरेसी बहुत अच्छी मानी जाती है.
नई दिल्ली.
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को बहस हुई, जहां केंद्रीय चुनाव आयोग (ईसीआई) को बिहार और बंगाल के मामले में सवालों के जवाब देने पड़े. भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले बेंच में शामिल जस्टिम जॉयमाल्या बागची ने पश्चिम बंगाल और बिहार में एसआईआर के बीच के अंतरों पर रोशनी डाली, खासकर तार्किक विसंगति सूची बनाने के मामले में.
उन्होंने कहा, “हमने संवैधानिक संस्था को मतदाता सूची की शुद्धता के मुद्दे की जांच करने की अनुमति दी है. SIR पर आपकी मूल ECI अधिसूचना में 2002 की सूची का ज़िक्र नहीं था. लेकिन, आपकी तार्किक विसंगति सूची को अस्वीकार करने के कारणों में 2002 की सूची वगैरह शामिल हैं. आपकी अधिसूचना उन लोगों से संबंधित थी, जिनका 2002 की सूची में शामिल लोगों से कोई जुड़ाव था. 2002 की सूची ही एक पैमाना है.”
जस्टिम जॉयमाल्या बागची ने आगे कहा, “ज़रा अपनी अंतिम सूची देखिए – आपने 2002 की सूची के सदस्यों को हटाया नहीं है. जब बिहार SIR पर बहस हुई थी, तब ECI की दलीलें बिल्कुल स्पष्ट थीं कि 2002 की सूची के सदस्यों को कोई भी दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं है. कृपया बिहार मामले में अपनी लिखित दलीलें देखें. आपने कहा था कि 2002 के मतदाताओं को दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं है.”
जब ECI के वकील, सीनियर एडवोकेट DS नायडू ने कहा कि लोगों को यह साबित करना होगा कि वे वही व्यक्ति हैं जो 2002 की सूची में थे, तो जस्टिस बागची ने कहा, “अब आप उन दलीलों में सुधार कर रहे हैं जो आपने पहले दी थीं.” जस्टिस बागची ने यह भी टिप्पणी की कि न्यायिक अधिकारियों से भी निर्णय प्रक्रिया के दौरान कुछ गलतियां हुई होंगी. उन्होंने कहा, “यदि आप एक दिन में 1000 दस्तावेज़ देखते हैं, और यदि सटीकता 70 प्रतिशत है, तो इस काम को बेहतरीन माना जाना चाहिए. इसलिए, गलतियों की गुंजाइश तो रहेगी ही, और हमें एक मज़बूत अपीलीय मंच की आवश्यकता है.”
यह टिप्पणी करते हुए कि वोट देने का अधिकार निरंतर होना चाहिए और अदालत आने वाले चुनावों की गहमागहमी और हंगामे से आंखें नहीं मूंद सकती, जज ने आगे कहा, “जिस देश में आपका जन्म हुआ है, वहां वोट देने का अधिकार न केवल संवैधानिक है, बल्कि भावनात्मक भी है. यह ऐसा है जैसे आप लोकतंत्र का एक हिस्सा हैं और सरकार चुनने में मदद करते हैं.”
‘बार एंड बेंच’ में प्रकाशित खबर के मुताबिक, जब नायडू ने कहा कि जिन राज्यों में SIR (विशेष पहचान समीक्षा) की गई थी, उनके तुलनात्मक आंकड़ों में पश्चिम बंगाल किसी भी तरह से अलग नहीं दिख रहा था, तो जस्टिस बागची ने कहा कि बिहार में विसंगतियों की कोई तार्किक सूची मौजूद नहीं थी. नायडू ने जवाब दिया कि बिहार में भी नाम खारिज किए गए थे, लेकिन वहां कोई अपील प्रक्रिया नहीं थी. इस पर, जस्टिस बागची ने कहा, “अपीलीय न्यायाधिकरण के लिए, यह मतदाता सूचियों को बढ़ाने या घटाने के बीच की कोई प्रतियोगिता नहीं है. उन्हें समावेशन (शामिल करने) के सिद्धांतों के आधार पर ही सुनवाई करनी होगी.”




