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लोकसभा हो या 2027 वाला उत्तर प्रदेश का चुनाव, नहीं पड़ेगा एक भी फर्जी वोट, CJI जस्टिस सूर्यकांत ने बता दिया तरीका

चुनावी धांधली और फर्जी वोटिंग खत्म करने की तैयारी होने लगी है. सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए मतदाताओं की बायोमेट्रिक और फेशियल रिकग्निशन जांच करने की संभावना पर विचार करने के लिए सहमति दे दी है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है. हालांकि, कोर्ट ने कहा कि बंगाल तो नहीं यूपी 2027 और आगामी लोग सभा में संभवतः इसे लागू करने पर विचार किया जा सकता है. इस तकनीक से घोस्ट वोटर्स और एक से अधिक बार वोट डालने की समस्या पूरी तरह खत्म हो सकती है.

 

Biometric And Facial Recognition in Election: भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ा ताकत- ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ है. लेकिन, अक्सर हम खबरों में सुनते हैं कि ‘मेरा वोट कोई और डाल गया’ या ‘फर्जी वोटिंग’ के कारण चुनाव के नतीजे प्रभावित हुए. अब इन समस्याओं का परमानेंट इलाज होने जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के लिए हामी भर दी है, जो भारतीय चुनाव प्रणाली का चेहरा हमेशा के लिए बदल सकती है.

चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने वकील अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) को नोटिस जारी किया है. अदालत इस बात की जांच करेगी कि क्या वोट डालने से पहले मतदाता की पहचान बायोमेट्रिक (अंगूठे का निशान या पुतली का स्कैन) और फेशियल रिकग्निशन (चेहरा पहचान तकनीक) के जरिए करना संभव है.

रातों-रात लागू करना संभव नहीं

सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यह प्रस्ताव बेहद गंभीर है और चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता बनाए रखने के लिए इस पर विचार करना जरूरी है. हालांकि, कोर्ट ने कड़वी सच्चाई बताते हुए कहा कि यह व्यवस्था रातों-रात लागू नहीं की जा सकती. इसके लिए मौजूदा नियमों में बड़े बदलाव करने होंगे और भारी-भरकम बजट की भी जरूरत होगी.

आम आदमी के लिए क्यों है यह जरूरी?

 

अक्सर वोटर लिस्ट में घोस्ट वोटर्स (मृत या फर्जी लोग) के नाम होते हैं, जिनका फायदा उठाकर असामाजिक तत्व फर्जी वोटिंग करते हैं. वर्तमान में हम सिर्फ वोटर आईडी कार्ड और उंगली पर लगी स्याही पर भरोसा करते हैं, जिसमें हेराफेरी की गुंजाइश बनी रहती है. लेकिन नई तकनीक आने से कम से इन पर तो लगाम लगेगा-
  • पहचान की चोरी असंभव: आपका चेहरा और अंगूठे का निशान पूरी दुनिया में सिर्फ आपका है. कोई और आपकी जगह वोट नहीं डाल पाएगा.
  • पारदर्शिता: हर वोट का एक डिजिटल और रियल-टाइम ऑडिट ट्रेल होगा.
  • प्रवासी मतदाताओं की सुविधा: भविष्य में यह तकनीक घर से दूर रहने वाले मतदाताओं के लिए सुरक्षित वोटिंग की राह भी खोल सकती है.

अभी क्यों नहीं लागू हो सकता?

 

अदालत ने साफ किया कि आगामी चुनावों में इसे लागू करना संभव नहीं है. मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि चुनाव आयोग सहमत भी हो जाए, तो वित्त मंत्रालय से बजट पास कराना और राज्य सरकारों का सहयोग लेना एक लंबी प्रक्रिया है. कोर्ट ने कहा, ‘हम इस पर विचार करेंगे कि क्या अगले संसदीय चुनावों या विधानसभा चुनावों के लिए ऐसा रास्ता अपनाया जा सकता है.’

आधार और डिजिटल ढांचा

याचिका में तर्क दिया गया है कि जब हम बैंक खाता खोलने से लेकर सिम कार्ड लेने तक के लिए बायोमेट्रिक का इस्तेमाल कर सकते हैं, तो देश की सरकार चुनने के लिए इसका उपयोग क्यों नहीं होना चाहिए? इसे आधार आधारित पहचान प्रणाली से जोड़कर चुनाव को पूरी तरह ‘हैकर-प्रूफ’ और ‘फ्रॉड-प्रूफ’ बनाया जा सकता है.

चुनाव में फेसियल रिकग्निशन और बायोमेट्रिक के उपयोग से जुड़े कुछ अहम सवाल-जवाब

क्या आने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव में फेशियल रिकग्निशन शुरू हो जाएगा?
नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि इसे तुरंत लागू करना प्रशासनिक और कानूनी रूप से संभव नहीं है. हालांकि, कोर्ट भविष्य के चुनावों (अगले संसदीय या राज्य चुनावों) में इसकी संभावनाओं को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांग रहा है.
बायोमेट्रिक और चेहरा पहचानने वाली तकनीक से आम वोटर को क्या फायदा होगा?
इससे फर्जी वोटिंग और दूसरे के नाम पर वोट डालना पूरी तरह रुक जाएगा. अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि उनके बूथ पर पहुंचने से पहले ही उनका वोट कोई और डाल गया है, इस तकनीक के आने के बाद ऐसा करना नामुमकिन हो जाएगा.
क्या इस तकनीक के लिए वोटर को फिर से कोई नया कार्ड बनवाना होगा?
अभी यह स्पष्ट नहीं है, लेकिन याचिका में सुझाव दिया गया है कि इसे मौजूदा डिजिटल डेटाबेस, जैसे आधार या डिजिटल वोटर आईडी से जोड़ा जा सकता है. इससे अलग से कार्ड बनवाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि मतदान केंद्र पर लगी मशीन ही आपकी असली पहचान की पुष्टि कर देगी.

 

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