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महिला आरक्षण पर सरकार vs विपक्ष: पीएम मोदी ने मांगा समर्थन, तो खरगे बोले- पहले भरोसे में लें

महिला आरक्षण से जुड़े ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर सभी दलों को साथ लाने की पहल करते हुए लोकसभा और राज्यसभा के नेताओं को पत्र लिखा है. वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस पहल पर सवाल उठाते हुए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर दी है.
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा और राज्यसभा के सभी दलों के नेताओं को पत्र लिखकर इस ऐतिहासिक विधेयक पर समर्थन देने की अपील की है. वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस पहल पर सवाल उठाते हुए सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग कर दी है. ऐसे में महिला आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पत्र में कहा कि 16 अप्रैल से संसद में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर ऐतिहासिक चर्चा शुरू होने जा रही है. उन्होंने इसे लोकतंत्र को मजबूत करने और सभी को साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता का प्रतीक बताया. उन्होंने लिखा कि महिलाओं को निर्णय लेने और नेतृत्व में भागीदारी देना किसी भी समाज की प्रगति के लिए आवश्यक है. भारत के विकास के लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी है कि नारी शक्ति पूरी क्षमता के साथ इस यात्रा में शामिल हो.
पीएम मोदी ने यह भी कहा कि देश की बेटियां आज स्पेस, खेल, सेना और स्टार्टअप्स जैसे हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं. ऐसे में राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ाना समय की मांग है.
2023 की एकजुटता का जिक्र
प्रधानमंत्री ने अपने पत्र में साल 2023 का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय संसद में सभी दलों ने मिलकर ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का समर्थन किया था. उन्होंने इसे भारत के लोकतंत्र की सामूहिक इच्छाशक्ति का उदाहरण बताया. पीएम मोदी ने कहा कि उस दिन को वह भारत की संसदीय यात्रा का एक प्रेरक और ऐतिहासिक क्षण मानते हैं. उन्होंने उम्मीद जताई कि इस बार भी सभी दल उसी भावना के साथ आगे आएंगे.
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पत्र में एक बड़ा संकेत देते हुए कहा कि गहन विचार-विमर्श के बाद यह निष्कर्ष निकला है कि अब समय आ गया है कि इस कानून को पूरी तरह लागू किया जाए. उन्होंने सुझाव दिया कि 2029 का लोकसभा चुनाव और उसके बाद होने वाले सभी विधानसभा चुनाव महिला आरक्षण लागू होने के बाद ही कराए जाएं. उनका मानना है कि इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं में नई ऊर्जा आएगी और जन-विश्वास मजबूत होगा.
खरगे ने उठाए सवाल
प्रधानमंत्री के इस पत्र के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सरकार पर कई सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने कहा कि विशेष सत्र विपक्ष को विश्वास में लिए बिना बुलाया गया है. खरगे ने आरोप लगाया कि सरकार परिसीमन (Delimitation) जैसे अहम मुद्दे पर कोई स्पष्ट जानकारी साझा नहीं कर रही है, जबकि यह कानून उससे जुड़ा हुआ है. उन्होंने अपने जवाब में लिखा कि 2023 में इस विधेयक को सर्वसम्मति से पारित किया गया था और उस समय कांग्रेस ने इसे तुरंत लागू करने की मांग की थी. लेकिन अब 30 महीने बाद सरकार इसे फिर से चर्चा में ला रही है.
सर्वदलीय बैठक की मांग
खरगे ने मांग की कि 29 अप्रैल के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, जिसमें परिसीमन और अन्य संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा हो सके. उन्होंने कहा कि बिना सभी दलों को भरोसे में लिए इस तरह का विशेष सत्र बुलाना लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है. उनका आरोप है कि सरकार इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रही है.
कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने पत्र में नोटबंदी, जीएसटी, जनगणना और वित्तीय सिफारिशों जैसे सरकार के पिछले फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि इन मामलों में सरकार का रिकॉर्ड भरोसेमंद नहीं रहा है. उन्होंने कहा कि प्रस्तावित संवैधानिक संशोधनों का असर केंद्र और राज्यों दोनों पर पड़ेगा, इसलिए सभी पक्षों को शामिल करना जरूरी है.
‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लेकर मौजूदा स्थिति यह दिखाती है कि यह मुद्दा सिर्फ सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा बन चुका है. एक तरफ जहां सरकार इसे महिलाओं के सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे जल्दबाजी में लिया गया फैसला और राजनीतिक एजेंडा करार दे रहा है.
महिला आरक्षण का महत्व
यह विधेयक संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान करता है. लंबे समय से इसकी मांग की जा रही थी और इसे भारतीय राजनीति में लैंगिक संतुलन की दिशा में बड़ा कदम माना जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे न सिर्फ महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि नीति-निर्माण में भी विविधता आएगी.
अब सभी की नजर 16 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र पर टिकी है. यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार और विपक्ष इस मुद्दे पर किसी साझा सहमति तक पहुंच पाते हैं या फिर यह बहस और ज्यादा राजनीतिक रंग ले लेती है.




