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असम : चुनावी खेल में मोदीजी के शाशनमें संविधान तार-तार ?

असम के मुख्यमंत्री मोदीजीके चहिते  हिमंता बिस्वासरमा मुस्लिम विरोधी अपने बयानों के लिए अक्सर सुर्खियों में आ जाते हैं।

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वासरमा मुस्लिम विरोधी अपने बयानों के लिए अक्सर सुर्खियों में आ जाते हैं। भाजपा ने उन्हें असम में मुख्यमंत्री क्यों बनाया है और क्यों वो मोदी-शाह की आंखों के तारे बने हुए हैं, यह समझना कठिन नहीं है। हिमंता बिस्वासरमा का बस चले तो असम को वे देश का पहला हिंदू राज्य घोषित कर दें, क्योंकि बार-बार लगातार उनके बयानों में यही संदेश सामने आता है कि मुसलमानों को राज्य से बाहर किया जाए। अभी कुछ दिनों पहले हिमंता बिस्वासरमा का एक वीडियो भी काफी वायरल हुआ था, जिसमें वो मुसलमान दिख रहे लोगों पर निशाना साध रहे थे। असम की भाजपा ईकाई ने यह वीडियो जारी किया था और इसमें ऊपरी तौर पर घुसपैठियों को बाहर करने का संदेश था, लेकिन असल निशाना अल्पसंख्यक समुदाय पर ही था। और जहां तक घुसपैठियों को बाहर करने या उन पर कार्रवाई करने का सवाल है, तो यह काम भी कानून के दायरे में होना चाहिए। अगर सत्ता पर बैठा शख्स हाथ में बंदूक लेकर इंसाफ करने निकल पड़े तो फिर देश में अदालतों की जरूरत ही क्या होगी। अफसोस इस बात का है कि सुप्रीम कोर्ट की राय इस बारे में अलग है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हिमंत बिस्वासरमा के खिलाफ वायरल वीडियो पर कार्रवाई की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की बेंच ने याचिकाकर्ताओं से गुवाहाटी हाई कोर्ट जाने को कहा। कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनावों से पहले ऐसे कई मामले सामने आते हैं। यह एक चलन बनता जा रहा है। असम में आने वाले विधानसभा चुनावों का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि समस्या यह है कि चुनाव का एक हिस्सा उससे पहले लड़ा जाता है।
इस बात पर कोई दो राय नहीं है कि चुनावों में विरोधी पर वार करने के लिए कई बार कानूनी लड़ाइयों का सहारा लिया जाता है। बल्कि मोदी के शासनकाल में तो जांच एजेंसियों का भी खुला इस्तेमाल होने लगा है। लेकिन असम का यह मामला कल्पना से उपजा आरोप नहीं है, बल्कि हिमंता बिस्वासरमा ने जिस तरह मुसलमान को बंदूक की नोक पर रखा है, वह बेहद गंभीर मामला है, क्योंकि इसमें न केवल कानून और संवैधानिक पद की मर्यादा का मखौल उड़ाया गया है, बल्कि भारत की धर्मनिरपेक्षता के चिथड़े-चिथड़े करने की मानसिकता झलकी है।
गौरतलब है कि 8 फरवरी को कांग्रेस ने दावा किया कि असम भाजपा के एक्स हैंडल से एक वीडियो पोस्ट किया गया जिसमें असम सीएम हिमंत बिस्वासरमा मुसलमानों को गोली मारते दिख रहे हैं। कांग्रेस ने कहा कि ये वीडियो अल्पसंख्यकों की टार्गेटेड पॉइंट-ब्लैंक हत्या को बढ़ावा देने जैसा है। कांग्रेस का दावा है कि वीडियो डिलीट कर दिया गया है। लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत के एक्स हैंडल पर दिख रहे वीडियो में नजर आ रहा है कि असम मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वासरमा कथित तौर पर एक राइफल से निशाना साधते और दो लोगों पर गोली चलाते हुए दिख रहे थे। निशाने में दिख रही तस्वीर में एक ने टोपी पहनी थी और दूसरे की दाढ़ी थी। इसका कैप्शन पॉइंट-ब्लैंक शॉट था।

श्रीनेत ने इस वीडियो को शेयर करते हुए पूछा था कि क्या अदालतें और अन्य संस्थाएं सो रही हैं? वहीं कांग्रेस महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने कहा था कि यह नरसंहार का आह्वान करने के अलावा और कुछ नहीं है। एक ऐसा सपना जिसे यह फासीवादी शासन दशकों से पाले हुए है।

श्री बिस्वासरमा के इस वीडियो पर कांग्रेस, आरजेडी, शिवसेना समेत कई विपक्षी दलों ने आलोचना कर कार्रवाई की मांग की थी। लेकिन हिमंता बिस्वासरमा पर कोई फर्क नहीं पड़ा था। उनका कहना था कि जेल जाने के लिए तैयार रहूंगा, लेकिन घुसपैठियों का मुद्दा नहीं छोड़ूंगा। जिस तरीके से हिमंता बिस्वासरमा ने अपने बयान को सही ठहराया था, उससे सवाल उठता है कि क्या उन्हें पता था कि जब तक मोदी-शाह का हाथ उनकी पीठ पर है, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

यहां ये भी याद कर लेना चाहिए कि इससे पहले हिमंता बिस्वासरमा ने 27 जनवरी को कहा था कि राज्य में स्पेशल रिवीजन में 4 से 5 लाख मिया मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाएंगे। उन्होंने लोगों से मिया समुदाय को परेशान करने की अपील की ताकि वे असम से चले जाएं। उन्होंने सीधे-सीधे एक समुदाय को निशाने पर लेकर उसे मानसिक, शारीरिक और आर्थिक तौर पर परेशान करने की बात कही, नागरिक के वोट के अधिकार को छीनने की बात कही, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को अगर लगता है कि चुनाव से पहले ऐसे मामले आने का ट्रेंड बन गया है, तो फिर हताशा और निराशा ही हाथ लगती है।

इस समय सुप्रीम कोर्ट के पास एक बड़ा मौका था कि वह मुख्यमंत्री बिस्वासरमा को सफाई पेश करने बुलाती और धार्मिक पूर्वाग्रह के आधार पर भेदभाव फैलाने और हिंसा के लिए उकसाने पर चेतावनी देती। सुप्रीम कोर्ट का यह छोटा सा कदम लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए साथ ही भारत के ताने-बाने को बचाने के लिए मील का पत्थर साबित हो सकता था। लेकिन फिलहाल यह मौका भी हाथ से निकल गया है। अब शायद हिमंता बिस्वासरमा और उन जैसे संकीर्ण, कट्टर सोच रखने वाले नेताओं के हौसले और बढ़ जाएं। पहले धर्मसंसदों के मंच से जो हिंसक आह्वान अल्पसंख्यकों के लिए हुआ करते थे अब उन पर सरकारी मुहर लगनी शुरु हो जाएगी तो फिर देश किस हाल में पहुंचेगा, यह सोचकर रुह कांप जाती है।

 

 

 

 

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