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क्‍या है तलाक-ए-हसन? जिसपर कैंची चला सकते हैं CJI सूर्यकांत, याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने ‘तलाक-ए-हसन’ की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है. सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है. याचिका में इस प्रथा को एकतरफा और महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताया गया है. इसमें पति तीन महीने के अंतराल पर तलाक देता है, जिसमें सुलह की गुंजाइश तो रहती है, लेकिन अंतिम अधिकार केवल पुरुष के पास होना इसे विवादित बनाता है.

 

नई दिल्ली
 तीन तलाक के बाद अब ‘तलाक-ए-हसन’ की संवैधानिक वैधता सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस प्रथा को चुनौती देने वाली एक नई याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील जयना कोठारी ने दलील दी कि यह प्रथा न केवल एकतरफा है बल्कि महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन भी है. कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे विस्तृत सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है जिससे मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक की इस प्रक्रिया पर एक बार फिर नई बहस छिड़ गई है.

एकतरफा तलाक के खिलाफ कानूनी जंग
सुप्रीम कोर्ट में दायर नई याचिका में तलाक-ए-हसन को ‘असंवैधानिक’ और ‘अमानवीय’ घोषित करने की मांग की गई है. याचिकाकर्ता के अनुसार, पति द्वारा भेजा गया तलाक का नोटिस पूरी तरह मनमाना है. सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र सरकार से पूछा है कि इस तरह की प्रथाओं को विनियमित करने के लिए वर्तमान में क्या स्थिति है. गौरतलब है कि साल 2025 से ही इस मुद्दे पर विभिन्न याचिकाएं कोर्ट के समक्ष लंबित हैं, जिनमें इसे लैंगिक न्याय के खिलाफ बताया गया है.
क्‍या होता है तलाक-ए-हसन?
तलाक-ए-हसन में पति तीन महीने के अंतराल पर तीन बार ‘तलाक’ बोलकर निकाह खत्म कर देता है. याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से पुरुष-केंद्रित है और इसमें महिला की सहमति या सुनवाई का कोई स्थान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट अब इस बात की जांच करेगा कि क्या यह प्रथा अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करती है. केंद्र को अब इस पर अपना विस्तृत हलफनामा कोर्ट में पेश करना होगा.
तलाक-ए-हसन: नियम और प्रक्रिया से जुड़े 5 बड़े सवाल-जवाब
तलाक-ए-हसन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों दी गई है?
याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रथा एकतरफा और भेदभावपूर्ण है, क्योंकि इसमें केवल पति के पास अधिकार है. यह मुस्लिम महिलाओं के समानता और सम्मान से जीने के अधिकार का उल्लंघन करती है. कोर्ट अब इसकी संवैधानिकता की जांच कर रहा है कि क्या यह आधुनिक कानून के अनुकूल है.
’तलाक-ए-बिद्दत’ में एक बार में तीन बार तलाक कहकर तुरंत निकाह खत्म कर दिया जाता था, जिसे कोर्ट ने पहले ही बैन कर दिया है. इसके विपरीत, तलाक-ए-हसन में तीन महीने का समय मिलता है और हर महीने एक बार तलाक कहा जाता है, जिससे प्रक्रिया लंबी होती है.
सवाल: तलाक-ए-हसन की प्रक्रिया के दौरान सुलह का क्या रास्ता है?
इस प्रक्रिया के दौरान पहले और दूसरे महीने में पति-पत्नी के बीच सुलह की संभावना बनी रहती है. यदि इस अवधि के दौरान उनके बीच शारीरिक संबंध (सहवास) स्थापित हो जाता है, तो तलाक की प्रक्रिया स्वतः ही रद्द मानी जाती है और निकाह कायम रहता है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से क्या जवाब मांगा है?
सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने केंद्र को नोटिस जारी कर इस प्रथा की कानूनी वैधता पर अपनी राय स्पष्ट करने को कहा है. कोर्ट यह समझना चाहता है कि क्या इस प्रथा को बनाए रखना संविधान के तहत उचित है या इसमें बदलाव की आवश्यकता है.
इस मामले में याचिकाकर्ता जयना कोठारी की मुख्य दलील क्या है?
वरिष्ठ वकील जयना कोठारी ने कोर्ट को बताया कि उनके मुवक्किल को पति की ओर से मनमाना तलाक का नोटिस मिला है. उन्होंने इसे एकतरफा कार्रवाई बताया और मांग की कि कोर्ट इस प्रक्रिया को अवैध घोषित करे क्योंकि यह महिलाओं के विरुद्ध अत्यधिक भेदभावपूर्ण है.

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