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‘सलाह देना धमकी नहीं’, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को सिखाया कानून, वकील को डराना महंगा पड़ेगा, रद्द हुई FIR

सुप्रीम कोर्ट ने 20 जनवरी के अपने आदेश में कहा, “किसी वकील (इस मामले में अपीलकर्ता) की पेशेवर कर्तव्य निर्वहन के रूप में सलाह या सुझाव देने की क्षमता मात्र उपस्थिति को धमकी नहीं माना जा सकता है और यह मूलभूत तथ्य इस मामले में स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं है.” सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज स्पष्ट बयान से यह पता चलता है कि आपराधिक धमकी का कोई इरादा प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं हुआ है.
नई दिल्ली.
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों के हक में एक बड़ा और राहत भरा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर कोई वकील अपने प्रोफेशनल ड्यूटी के तहत किसी को सलाह या सुझाव देने के लिए मौजूद है, तो उसे ‘धमकी’ नहीं माना जा सकता. जस्टिस अरविंद कुमार और पीबी वराले की बेंच ने एक वकील बेरी मनोज के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की.
पुलिस ने आईपीसी की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत केस दर्ज किया था. कोर्ट ने कहा कि अगर आरोप साफ नहीं हैं और सिर्फ शक के आधार पर एफआईआर हुई है, तो यह गलत है. यह मामला एक पॉक्सो केस के आरोपी के रिश्तेदार से जुड़ा था, जो पेशे से वकील हैं. कोर्ट ने माना कि डराने का इरादा साबित हुए बिना केस नहीं चल सकता.
‘सलाह देना पेशेवर काम, इसे डराना नहीं कह सकते’
कोर्ट ने 20 जनवरी के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एक वकील (अपीलकर्ता) अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी निभा रहा था. सलाह या सुझाव देने की क्षमता में उसकी उपस्थिति को धमकी के रूप में नहीं देखा जा सकता. इस मामले में डराने-धमकाने का कोई सबूत नहीं मिला. बेंच ने कहा कि आईपीसी की धारा 506 के तहत अपराध तभी बनता है जब आरोपी का इरादा पीड़ित के मन में डर पैदा करने का हो. अगर इरादा स्पष्ट नहीं है, तो महज बयानों के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
कोर्ट ने 20 जनवरी के अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एक वकील (अपीलकर्ता) अपनी प्रोफेशनल ड्यूटी निभा रहा था. सलाह या सुझाव देने की क्षमता में उसकी उपस्थिति को धमकी के रूप में नहीं देखा जा सकता. इस मामले में डराने-धमकाने का कोई सबूत नहीं मिला. बेंच ने कहा कि आईपीसी की धारा 506 के तहत अपराध तभी बनता है जब आरोपी का इरादा पीड़ित के मन में डर पैदा करने का हो. अगर इरादा स्पष्ट नहीं है, तो महज बयानों के आधार पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता.
बयानों में बदलाव और पुलिस की थ्योरी फेल
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि पीड़ित ने पुलिस (CrPC 161) और मजिस्ट्रेट (CrPC 164) के सामने जो बयान दिए, उनमें काफी अंतर था. बाद के बयानों में ‘सुधार’ (Improvement) किया गया था, जो संदेह पैदा करता है. चार्जशीट में मुख्य आरोप धारा 506 का था, जो घटना के आठ दिन बाद दर्ज बयान पर आधारित था. कोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आपराधिक धमकी का कोई मामला नहीं बनता है.
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि पीड़ित ने पुलिस (CrPC 161) और मजिस्ट्रेट (CrPC 164) के सामने जो बयान दिए, उनमें काफी अंतर था. बाद के बयानों में ‘सुधार’ (Improvement) किया गया था, जो संदेह पैदा करता है. चार्जशीट में मुख्य आरोप धारा 506 का था, जो घटना के आठ दिन बाद दर्ज बयान पर आधारित था. कोर्ट ने पाया कि प्रथम दृष्टया (Prima Facie) आपराधिक धमकी का कोई मामला नहीं बनता है.
हाईकोर्ट का फैसला पलटा, वकील को मिली राहत
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें वकील के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की बात कही गई थी. मनोज के खिलाफ 2022 में शुरू की गई कार्यवाही को अब पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस मामले में शामिल अन्य आरोपियों के खिलाफ संबंधित निचली अदालत में केस चलता रहेगा. 2022 में तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर हुई थी और बाद में पांच लोगों पर चार्जशीट दाखिल की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें वकील के खिलाफ कार्यवाही जारी रखने की बात कही गई थी. मनोज के खिलाफ 2022 में शुरू की गई कार्यवाही को अब पूरी तरह निरस्त कर दिया गया है. हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस मामले में शामिल अन्य आरोपियों के खिलाफ संबंधित निचली अदालत में केस चलता रहेगा. 2022 में तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर हुई थी और बाद में पांच लोगों पर चार्जशीट दाखिल की गई थी.




