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‘ट्रेड यूनियन की वजह से खत्म हो रहीं नौकरियां’, सीजेआई सूर्यकांत बोले- इन्होंने ठप करवा दी कई इंडस्ट्री

सुप्रीम कोर्ट के CJI सूर्यकांत ने ट्रेड यूनियनों को औद्योगिक विकास रुकने का जिम्मेदार बताया. घरेलू कामगारों को न्यूनतम वेतन देने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए सीजेआई ने कहा-अगर ऐसा हो गया तो लोग घरों में नौकर रखना बंद कर देंगे.
नई दिल्ली.
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने गुरुवार को ट्रेड यूनियंस को जमकर सुनाया. घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सीजेआई ने दो-टूक कहा कि देश में इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट रुकने और पारंपरिक उद्योगों के तबाह होने के लिए काफी हद तक ट्रेड यूनियन जिम्मेदार हैं. उनकी वजह से नौकरियां खत्म हो रही हैं. सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने साफ कहा कि अगर घरेलू कामगारों को लेकर ज्यादा सख्त नियम बनाए गए, तो हर घर मुकदमेबाजी में उलझ जाएगा और लोग काम पर रखना ही बंद कर देंगे.
सुनवाई के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने बेहद तल्ख लहजे में कहा कि देश के पारंपरिक उद्योगों के बंद होने के पीछे तथाकथित झंडे वाली यूनियनों का बड़ा हाथ रहा है. यह सच्चाई सामने आनी चाहिए कि देश में कितनी औद्योगिक इकाइयां सिर्फ ट्रेड यूनियनों के कारण बंद हो गई हैं. ये लोग काम नहीं करना चाहते. ट्रेड यूनियन के नेता देश में औद्योगिक विकास रोकने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं.
सीजेआई ने कहा कि शोषण होता है, इससे इनकार नहीं है, लेकिन उससे निपटने के लिए लोगों को व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति जागरूक करना और उन्हें स्किल्ड बनाना ज्यादा जरूरी है. सुधारों की अत्यधिक चिंता कभी-कभी उल्टे परिणाम देती है.
‘हर घर में पहुंच जाएगा मुकदमा, रोजगार खत्म हो जाएंगे’
यह याचिका ‘पेन थोजिलारगल संगम’ और अन्य यूनियनों ने दायर की थी, जिसमें घर में काम करने वाले नौकरों, मेड के लिए न्यूनतम वेतन और अन्य कल्याणकारी उपायों की मांग की गई थी. इस पर सीजेआई ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर कोर्ट ने ऐसी मांगें मान लीं, तो हर घर में कानूनी लड़ाई शुरू हो जाएगी. उन्होंने कहा, यदि न्यूनतम वेतन फिक्स कर दिया गया, तो डिमांड और सप्लाई का पूरा गणित बिगड़ जाएगा. लोग घर में काम करने के लिए नौकर रखना बंद कर देंगे, जिससे इन गरीब कामगारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा.
यह याचिका ‘पेन थोजिलारगल संगम’ और अन्य यूनियनों ने दायर की थी, जिसमें घर में काम करने वाले नौकरों, मेड के लिए न्यूनतम वेतन और अन्य कल्याणकारी उपायों की मांग की गई थी. इस पर सीजेआई ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर कोर्ट ने ऐसी मांगें मान लीं, तो हर घर में कानूनी लड़ाई शुरू हो जाएगी. उन्होंने कहा, यदि न्यूनतम वेतन फिक्स कर दिया गया, तो डिमांड और सप्लाई का पूरा गणित बिगड़ जाएगा. लोग घर में काम करने के लिए नौकर रखना बंद कर देंगे, जिससे इन गरीब कामगारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा.
दे रहे थे 40 हजार, मिल रहे थे 19 हजार
सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने जब दलील दी कि सामूहिक सौदेबाजी जरूरी है, तो कोर्ट ने कहा कि असली शोषण तो रोजगार एजेंसियां कर रही हैं. बड़े शहरों में इन एजेंसियों का वर्चस्व हो गया है. सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट का ही एक उदाहरण देते हुए बताया, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक एजेंसी के जरिए कर्मचारियों को रखा, तो प्रति कर्मचारी 40,000 रुपये दिए जा रहे थे. लेकिन बाद में पता चला कि कर्मचारी के हाथ में सिर्फ 19,000 रुपये ही आ रहे थे. बाकी पैसा एजेंसी खा रही थी.
सीनियर एडवोकेट राजू रामचंद्रन ने जब दलील दी कि सामूहिक सौदेबाजी जरूरी है, तो कोर्ट ने कहा कि असली शोषण तो रोजगार एजेंसियां कर रही हैं. बड़े शहरों में इन एजेंसियों का वर्चस्व हो गया है. सीजेआई ने सुप्रीम कोर्ट का ही एक उदाहरण देते हुए बताया, जब सुप्रीम कोर्ट ने एक एजेंसी के जरिए कर्मचारियों को रखा, तो प्रति कर्मचारी 40,000 रुपये दिए जा रहे थे. लेकिन बाद में पता चला कि कर्मचारी के हाथ में सिर्फ 19,000 रुपये ही आ रहे थे. बाकी पैसा एजेंसी खा रही थी.
सिंगापुर मॉडल यहां नहीं चल सकता
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि सिंगापुर जैसे देशों में घरेलू कामगारों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है और उन्हें साप्ताहिक छुट्टी मिलती है. इस पर सीजेआई ने कहा कि भारत में लाखों परिवार घरेलू सहायकों को अपने परिवार के सदस्य की तरह रखते हैं. उनके बीच एक ‘भरोसे’ का रिश्ता होता है. अगर एजेंसियों और कड़े कानूनों को बीच में लाया गया, तो यह मानवीय रिश्ता खत्म हो जाएगा और इसके गंभीर सामाजिक परिणाम होंगे. सिंगापुर मॉडल यहां नहीं चल सकता.
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि सिंगापुर जैसे देशों में घरेलू कामगारों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य है और उन्हें साप्ताहिक छुट्टी मिलती है. इस पर सीजेआई ने कहा कि भारत में लाखों परिवार घरेलू सहायकों को अपने परिवार के सदस्य की तरह रखते हैं. उनके बीच एक ‘भरोसे’ का रिश्ता होता है. अगर एजेंसियों और कड़े कानूनों को बीच में लाया गया, तो यह मानवीय रिश्ता खत्म हो जाएगा और इसके गंभीर सामाजिक परिणाम होंगे. सिंगापुर मॉडल यहां नहीं चल सकता.
कोर्ट का दखल देने से इनकार
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि कम वेतन पर काम कराना ‘बेगार’ या बंधुआ मजदूरी जैसा है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया. पीठ ने कहा कि जो राहतें मांगी गई हैं, वे कानून बनाने के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, जो कोर्ट का काम नहीं है. हालांकि, कोर्ट ने राज्यों से आग्रह किया कि वे घरेलू कामगारों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करें.
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि कम वेतन पर काम कराना ‘बेगार’ या बंधुआ मजदूरी जैसा है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया. पीठ ने कहा कि जो राहतें मांगी गई हैं, वे कानून बनाने के अधिकार क्षेत्र में आती हैं, जो कोर्ट का काम नहीं है. हालांकि, कोर्ट ने राज्यों से आग्रह किया कि वे घरेलू कामगारों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करें.




