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ठेका श्रमिकों की जगह स्थायी नियुक्ति पर पहले पुराने कामगारों को देना होगा मौका; सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ठेका श्रमिकों के हक में बड़ा फैसला देते हुए कहा है कि स्थायी नियुक्ति से पहले पुराने कामगारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अदालत ने साफ किया कि बाहर से नई भर्ती कर अनुभवी ठेका श्रमिकों की अनदेखी करना उचित नहीं है।

 

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने ठेका श्रमिकों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में साफ कहा कि अगर कोई कंपनी या संस्थान ठेका श्रमिकों की जगह नियमित कर्मचारियों को रखने का फैसला करता है, तो उसे पहले काम कर चुके ठेका श्रमिकों को मौका देना होगा। अदालत ने कहा कि पुराने श्रमिकों को नजरअंदाज कर बाहर से नए लोगों की भर्ती करना सही नहीं है।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस वी एन भट्टी की पीठ ने कहा कि यह प्राथमिकता केवल कागजों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि इसका असली फायदा ठेका श्रमिकों को मिलना चाहिए। इसके लिए नियोक्ता उम्र सीमा और पढ़ाई से जुड़ी शर्तों में ढील दे सकता है, खासकर उन पदों पर जहां तकनीकी योग्यता जरूरी नहीं होती। इससे लंबे समय से काम कर रहे अनुभवी श्रमिकों को नौकरी मिल सकेगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर यह साबित हो जाए कि ठेका व्यवस्था केवल दिखावे के लिए थी और असल में कंपनी ही श्रमिकों को सीधे नियंत्रित कर रही थी, तो ऐसे मामलों में ठेका मान्य नहीं होगा। ऐसे श्रमिकों को सीधे कंपनी का कर्मचारी माना जाएगा और उनकी सेवाओं को नियमित किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि ऐसे कर्मचारियों को वेतन, बकाया राशि और अन्य सभी लाभ भी मिलेंगे, जैसा कि नियमित कर्मचारियों को मिलता है।

हाईकोर्ट ने भी औद्योगिक न्यायालय के आदेश को सही ठहराया था
हाईकोर्ट ने औद्योगिक न्यायालय के आदेश को सही ठहराया, जिसके बाद कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 33(1) का लाभ तभी मिल सकता है, जब यह साबित हो जाए कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में कंपनी का श्रमिक है। यदि नियोक्ता और कर्मचारी के रिश्ते पर ही विवाद हो, तो अंतरिम स्तर पर ऐसी राहत देना गलत है, क्योंकि इससे बिना पूरी सुनवाई के अंतिम फैसला जैसा असर पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- आप दोबारा औद्योगिक न्यायालय जा सकते हैं
अदालत ने यह भी बताया कि ठेका श्रम कानून के तहत जिन श्रमिकों की सेवाएं समाप्त हो चुकी हैं, उन्हें अपने आप ‘श्रमिक’ नहीं माना जा सकता। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने औद्योगिक न्यायालय और हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों को रद्द कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने श्रमिकों को राहत देते हुए यह छूट दी कि वे दोबारा औद्योगिक न्यायालय जा सकते हैं। वे वहां यह साबित करने की कोशिश कर सकते हैं कि ठेका केवल दिखावा था या फिर यह मांग कर सकते हैं कि अगर कंपनी नियमित भर्ती करे, तो उन्हें पहले मौका दिया जाए।

औद्योगिक न्यायालय के आदेश को कंपनी ने दी है चुनौती
यह मामला तब सामने आया जब एक कंपनी ने औद्योगिक न्यायालय की ओर से दिए गए अंतरिम आदेश को चुनौती दी। उस आदेश में ठेका श्रमिकों को नियमित कर्मचारियों जैसे लाभ दिए गए थे। कंपनी का कहना था कि जब तक यह तय न हो जाए कि श्रमिक कंपनी के कर्मचारी हैं या नहीं, तब तक इस तरह की राहत नहीं दी जा सकती।

 

 

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