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भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की 17A क्या है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के 2 जजों की अलग-अलग राय?

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा टकराव सामने आया है. जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की बात कही, जबकि जस्टिस केवी विश्वनाथन ने लोकपाल/लोकायुक्त के जरिए स्वीकृति की शर्त के साथ इसे सीमित रूप से वैध माना है. यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत के पास गया है जो इस मामले को सुनने के लिए बड़ी पीठ बनाएंगे.
नई दिल्ली.
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बड़ा संवैधानिक टकराव सामने आया है. जब एक केस की सुनवाई के दौरान दो-जजों की पीठ ने इस प्रावधान की वैधता पर विभाजित फैसला सुनाया है. एक जज ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की बात कही, जबकि दूसरे जज ने इसे सीमित दायरे में वैध मानते हुए ‘रीड-डाउन’ किया. अब मामला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के पास भेज दिया गया है, जो बड़ी पीठ का गठन करेंगे.
क्या है S.17A?
धारा 17A (साल 2018 में हुए संशोधन) के तहत किसी लोक सेवक यानी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर जांच शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है. यदि आरोप उसके आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से जुड़े हों. हालांकि, रंगे हाथ रिश्वत लेते पकड़े जाने जैसे मामलों में यह शर्त लागू नहीं होती. स्वीकृति देने के लिए 3 महीने (अधिकतम 4 महीने) की समयसीमा तय है.
धारा 17A (साल 2018 में हुए संशोधन) के तहत किसी लोक सेवक यानी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर जांच शुरू करने से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य है. यदि आरोप उसके आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से जुड़े हों. हालांकि, रंगे हाथ रिश्वत लेते पकड़े जाने जैसे मामलों में यह शर्त लागू नहीं होती. स्वीकृति देने के लिए 3 महीने (अधिकतम 4 महीने) की समयसीमा तय है.
कौन-कौस से जस्टिस आए आमने-सामने?
– न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना (Justice BV Nagarathna)
– न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (Justice KV Viswanathan)
– न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना (Justice BV Nagarathna)
– न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (Justice KV Viswanathan)
जस्टिस नागरत्न ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि ‘धारा 17A असंवैधानिक’. उन्होंने कहा कि यह प्रावधान भ्रष्टों को बचाने का प्रयास है. उनका कहना था कि पहले मंजूरी लेने की शर्त भ्रष्टाचार निवारण कानून के उद्देश्य के विपरीत है. इससे केस की जांच रुकती है या उसमें रूकावट पैदा करती है. इससे भ्रष्ट अधिकारी का बचाव होता है और ईमानदार के साथ अन्याय होता है. यह उन सुरक्षा कवचों को दोबारा जिंदा करता है जिन्हें पहले ही विनीत नारायण और सुब्रह्माणयम स्वामी जैसे फैसलों में खारिज किया जा चुका है. धारा 17A को पूरी तरह रद्द किया जाना चाहिए.
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि ‘धारा 17A असंवैधानिक’. उन्होंने कहा कि यह प्रावधान भ्रष्टों को बचाने का प्रयास है. उनका कहना था कि पहले मंजूरी लेने की शर्त भ्रष्टाचार निवारण कानून के उद्देश्य के विपरीत है. इससे केस की जांच रुकती है या उसमें रूकावट पैदा करती है. इससे भ्रष्ट अधिकारी का बचाव होता है और ईमानदार के साथ अन्याय होता है. यह उन सुरक्षा कवचों को दोबारा जिंदा करता है जिन्हें पहले ही विनीत नारायण और सुब्रह्माणयम स्वामी जैसे फैसलों में खारिज किया जा चुका है. धारा 17A को पूरी तरह रद्द किया जाना चाहिए.
जस्टिस नागरत्न ने दिए कौन-कौन से फैसले
1- इलेक्ट्रोल बॉन्ड केस (2024)
जस्टिस नागरत्ना ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देने वाले बहुमत फैसले का समर्थन किया था. उन्होंने कहा था कि राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लोकतंत्र की आत्मा है. यह फैसला सरकार के खिलाफ सबसे बड़े संवैधानिक झटकों में से एक माना गया है.
जस्टिस नागरत्ना ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक करार देने वाले बहुमत फैसले का समर्थन किया था. उन्होंने कहा था कि राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लोकतंत्र की आत्मा है. यह फैसला सरकार के खिलाफ सबसे बड़े संवैधानिक झटकों में से एक माना गया है.
2. Article 370 पर फैसला (2023)
जस्टिस नागरत्ना ने अनुच्छेद 370 हटाने के तरीके पर असहमति जताई थी. उन्होंने कहा था कि राज्य को पहले समाप्त करना और फिर उसके अधिकार खत्म करना संवैधानिक रूप से सवालों के घेरे में है. यह राय उन्हें संवैधानिक मूल्यों की रक्षक जज के रूप में स्थापित करती है.
जस्टिस नागरत्ना ने अनुच्छेद 370 हटाने के तरीके पर असहमति जताई थी. उन्होंने कहा था कि राज्य को पहले समाप्त करना और फिर उसके अधिकार खत्म करना संवैधानिक रूप से सवालों के घेरे में है. यह राय उन्हें संवैधानिक मूल्यों की रक्षक जज के रूप में स्थापित करती है.
3. ED/CBI Powers पर टिप्पणियां
कई मामलों में उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियां कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं. इसी सोच के तहत उन्होंने S.17A को ‘भ्रष्टों को बचाने वाला कानून’ बताया.
कई मामलों में उन्होंने कहा कि जांच एजेंसियां कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं. इसी सोच के तहत उन्होंने S.17A को ‘भ्रष्टों को बचाने वाला कानून’ बताया.
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन क्या बोले?
जस्टिस केवी नाथ ने कहा कि 17 ए रद्द नहीं हो सकता है लेकिन इसकी वैधता सीमित है. उन्होंने कहा कि प्रावधान को पूरी तरह रद्द करना बच्चे के साथ नहाने का पानी फेंकने जैसा होगा. उनका तर्क है कि ईमानदार सरकारी कर्मचारियों को मनमानी/दुर्भावनापूर्ण जांच से बचाने के लिए संतुलन जरूरी है, वर्ना पॉलिसी पैरालाइसिस होगा. उन्होंने आगे कहा कि दुरुपयोग की संभावना किसी कानून को रद्द करने का आधार नहीं हो सकती है.
जस्टिस केवी नाथ ने कहा कि 17 ए रद्द नहीं हो सकता है लेकिन इसकी वैधता सीमित है. उन्होंने कहा कि प्रावधान को पूरी तरह रद्द करना बच्चे के साथ नहाने का पानी फेंकने जैसा होगा. उनका तर्क है कि ईमानदार सरकारी कर्मचारियों को मनमानी/दुर्भावनापूर्ण जांच से बचाने के लिए संतुलन जरूरी है, वर्ना पॉलिसी पैरालाइसिस होगा. उन्होंने आगे कहा कि दुरुपयोग की संभावना किसी कानून को रद्द करने का आधार नहीं हो सकती है.
जस्टिस के. वी. विश्वनाथन के बड़े फैसले
1. गिरफ्तार और बेल पर
1. गिरफ्तार और बेल पर
जस्टिस विश्वनाथन ने कई मामलों में कहा है कि गिरफ्तारी सजा नहीं, बल्कि जांच का साधन है. यह रुख व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम राज्य शक्ति के संतुलन को दर्शाता है.
2. Policy Paralysis पर चिंता
S.17A फैसले में उन्होंने कहा कि अगर ईमानदार अफसरों को सुरक्षा नहीं दी गई तो नीति-गत जड़ता पैदा होगी. यही सोच उनके पुराने फैसलों में भी दिखती है, जहां वे अधिकारों के साथ प्रशासनिक व्यावहारिकता पर ज़ोर देते हैं.




