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वेनेजुएला के बाद किसकी बारी? 5 देशों पर मंडरा रहा है कब्जे का खतरा, ट्रंप की ‘हिट लिस्ट’ में एक दोस्त भी

अमेरिका की विदेश नीति जिस तरह से बदलती हुई दिख रही है, उससे कई देशों पर खतरा मंडराने लगा है. अमेरिका का रणनीतिक बदलाव न केवल उसकी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है, बल्कि उसके पड़ोसी देशों और दुश्मनों में सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियों को जन्म दे रहा है.

 

 

अमेरिका ने जिस तरह से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर सैन्य कार्रवाई करके उन्हें गिरफ्तार किया है, उसके बाद दुनिया भर में यह सवाल उठने लगा है कि अमेरिका के टार्गेट पर अगला कौन सा देश होगा? ट्रंप का यह कदम केवल वेनेजुएला तक सीमित रहने वाला है, या फिर वो आगे बढ़कर वैश्विक शक्ति विस्तार की रणनीति बन रहा है? ईरान में जिस तरह से प्रदर्शनों को अमेरिका का समर्थन मिल रहा है, उसे लेकर आशंकाएं और गहरा रही हैं.

गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक वेनेजुएला में मादुरो की गिरफ्तारी को कई विश्लेषकों ने अवैध तख्तापलट तक बताया है, क्योंकि यह कार्रवाई बिना स्थानीय कानूनी या अंतरराष्ट्रीय संधियों के बल्कि सैन्य बल के इस्तेमाल से की गई दिखती है. यह कदम केवल ड्रग्स की अवैध तस्करी या अवैध प्रवास को रोकने के बहाने के तहत नहीं, बल्कि व्यापक सैन्य और राजनीतिक दबाव की शुरुआत भी माना जा रहा है. इस कार्रवाई के जरिये अमेरिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी देश में सैन्य और राजनीतिक बदलाव लाने के लिए सीधे हस्तक्षेप करने से नहीं डरता, ऐसे में यह चिंता करना जायज लगता है कि अगला निशाना कौन हो सकता है?

वेनेजुएला के बाद अमेरिका का अगला टार्गेट कौन?

अमेरिका के घरेलू और अंतरराष्ट्रीय संकेत हैं, जो बताते हैं कि उसकी विदेश नीति कुछ और देशों पर केंद्रित हो सकती है. वो खासकर ऐसे देश होंगे, जिनका अमेरिका से मतभेद या वैचारिक टकराव रहा है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण संभावित लक्ष्य के रूप में ईरान का नाम सामने आता है. कुछ विश्लेषकों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन पहले ही ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी दे चुका है और पिछले सप्ताह उसने ईरान पर नजर रखने की बात भी कही थी. ऐसे में आशंका ये है कि अगर अमेरिका को लगता है कि उसके सुरक्षा या ऊर्जा हितों पर कोई प्रत्यक्ष खतरा है, तो वह मध्य पूर्व में भी हस्तक्षेप करने से नहीं हिचकेगा.

क्यूबा को सीधी धमकी दे चुके हैं ट्रंप

 

ईरान के अलावा, क्यूबा अमेरिका की नीति में हमेशा से एक संवेदनशील बिंदु रहा है. क्यूबा ने पहले भी अमेरिका पर आरोप लगाया है कि वह उस देश की सरकार को बलपूर्वक बदलने की इच्छा रखता है. वो ट्रंप के टार्गेट पर इसलिए भी है क्योंकि वेनेजुएला के मामले में क्यूबा का समर्थन मादुरो को ऊर्जा और सैन्य सहायता देने में रहा है. क्यूबा का मानना है कि अमेरिका का यह कदम केवल तख्तापलट नहीं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे प्रभाव की इच्छा का परिणाम है.

कोलंबिया भी ट्रंप के निशाने पर

इसी तरह कोलंबिया ने भी अमेरिका की इस कार्रवाई पर गहरी चिंता जताई है. कोलंबिया के राष्ट्रपति सहित कई दक्षिण अमेरिकी देशों ने कहा है कि वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल सकता है और इससे पड़ोसी देशों की संप्रभुता भी चुनौती में पड़ सकती है. उनकी इस चिंता का मुख्य कारण ये है कि अगर अमेरिका का लक्ष्य केवल मादुरो ही था, तो वह बिना सैन्य हस्तक्षेप के भी कई वैकल्पिक उपाय अपना सकता था. बावजूद इसके उन्होंने सैन्य कार्रवाई की. कोलंबिया लैटिन अमेरिका का देश है और उसने जब ट्रंप का विरोध किया, तो ट्रंप ने वहां के राष्ट्रपति को सीधे-सीधे कहा कि वो पहले खुद को देखें, फिर दूसरों को.

डेनमार्क और ग्रीनलैंड भी हो सकते हैं टार्गेट

इन सभी देशों के अलावा, डेनमार्क और ग्रीनलैंड जैसे यूरोपीय क्षेत्र भी अमेरिकी विदेश नीति के संभावित विस्तार में आते दिख रहे हैं. डेनिश रक्षा खुफिया एजेंसी ने हाल ही में एक रिपोर्ट में संयुक्त राज्य अमेरिका को अपने सहयोगी के रूप में नहीं बल्कि एक संभव खतरा के रूप में सूचीबद्ध किया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका अब अपनी आर्थिक और तकनीकी शक्ति का उपयोग न सिर्फ प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ बल्कि अपने पुराने मित्रों और सहयोगियों के खिलाफ भी अपनी मर्जी थोपने के लिए कर रहा है. खासतौर पर ग्रीनलैंड के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने बार-बार यह सुझाव दिया है कि वह ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाना चाहते हैं. इस बयान ने डेनमार्क के साथ कूटनीतिक तनाव पैदा किया है. डेनमार्क ने स्पष्ट किया है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता और लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए और किसी भी प्रकार के बाहरी हस्तक्षेप को अस्वीकार किया है.

नाटो का संस्थापक रहा है डेनमार्क

दिलचस्प ये है कि डेनमार्क नाटो संघ के शुरुआती सदस्यों में से एक है. उसकी खुफिया रिपोर्ट केवल कूटनीतिक फिक्र तक सीमित नहीं है, उसने यह चेतावनी भी दी है कि अमेरिका अब आर्थिक ताकत को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है, जिसमें ऊंचे टैरिफ और आर्थिक दबाव शामिल हैं. रिपोर्ट ये भी संकेत देती है कि अमेरिका अपने सहयोगियों के खिलाफ भी सैन्य शक्ति का इस्तेमाल कर सकता है. यही वजह है कि नाटो में होने भी डेनमार्क की सुरक्षा की गारंटी नहीं देता. नाटो का आर्टिकल-5, जिसमें कहा गया कि किसी भी नाटो देश पर हमला पूरे संघ पर हमला होगा, वो भी अमेरिका नकार सकता है.

अमेरिका अब न दोस्तों का न दुश्मनों का

डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के दौरान अमेरिका की विदेश नीति में जबरदस्त बदलाव हुए हैं. अमेरिकी नीति केवल सैन्य विकल्पों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक और आर्थिक दबाव की रणनीति भी अपना रही है. कोलंबिया के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध, मैक्सिको पर टैक्स दरों के बढ़ते दबाव और अन्य देशों के साथ व्यापारिक तनाव को बढ़ावा देना आम बात नहीं है. ऐसे कदम यह संकेत देते हैं कि अमेरिका इंडियन पैसेफिक, यूरोपीय और लैटिन अमेरिकी क्षेत्रों में अपनी शक्ति और प्रभाव को फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. इससे न केवल पारंपरिक सुरक्षा गठबंधनों पर प्रभाव पड़ेगा, बल्कि यह वैश्विक राजनीति में अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांत भी धरे रह जाएंगे. वो सिर्फ पड़ोसियों नहीं, पूरे विश्व के सामने सुरक्षा चुनौतियां खड़ी कर रहा है.

 

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