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जेल से बाहर नहीं आएगा कुलदीप सेंगर, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर लगा दिया स्टे

सुप्रीम कोर्ट ने उन्नाव रेप कांड के दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद निलंबित करने के हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है. सीबीआई की याचिका पर विचार करते हुए चीफ जस्टिस की वेकेशन बेंच ने इस मामले में सेंगर को नोटिस जारी किया है. मामले की अगली सुनवाई चार हफ्ते बाद होगी. कुलदीप सेंगर अभी जेल में ही रहेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें 2017 के उन्नाव बलात्कार मामले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से निष्कासित नेता कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा को निलंबित कर दिया गया था. चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी तथा जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की अवकाशकालीन पीठ ने सेंगर को नोटिस जारी कर सीबीआई की उस याचिका पर जवाब मांगा जिसमें हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई है.

सीबीआई की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने का आग्रह किया. पीठ ने कहा कि वह इस मामले पर गौर करेगी. उसने कहा कि हाईकोर्ट के 23 दिसंबर के आदेश पर सेंगर को हिरासत से रिहा नहीं किया जाएगा. पीठ ने कहा कि इस मामले में कानून के कई अहम प्रश्न विचारणीय हैं और मामले की सुनवाई चार सप्ताह बाद के लिए स्थगित कर दी.

हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया था

हाईकोर्ट ने उन्नाव बलात्कार मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे सेंगर की सजा को यह कहते हुए निलंबित कर दिया था कि वह पहले ही सात साल और पांच महीने जेल में बिता चुके हैं. हाईकोर्ट ने बलात्कार मामले में दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देने वाली अपील लंबित रहने तक सेंगर की सजा को निलंबित कर दिया था. सेंगर ने इस मामले में दिसंबर 2019 के निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी है.

बहरहाल, भाजपा से निष्कासित नेता जेल में ही रहेगा क्योंकि वह पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत के मामले में 10 साल की सजा काट रहा है और उस मामले में उसे जमानत नहीं मिली है. बलात्कार का मामला और इससे जुड़े अन्य मामले अगस्त 2019 को हाईकोर्ट के निर्देश पर उत्तर प्रदेश की निचली अदालत से दिल्ली स्थानांतरित किए गए थे.

लोकसेवक मानने को लेकर हुई बहस

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि जब कोई कांस्टेबल ड्यूटी के दौरान ऐसा कृत्य करता है तो वह इस अपराध का दोषी होगा. उसी प्रकार यदि कोई सेना अधिकारी ड्यूटी पर रहते हुए ऐसा कृत्य करता है तो वह गंभीर यौन उत्पीड़न का दोषी होगा. इस अधिनियम में लोक सेवक की परिभाषा नहीं दी गई है और इसे उधार लेकर परिभाषित किया गया है. यानी आईपीसी में जो कहा गया है वही परिभाषा होगी, लेकिन परिभाषा संदर्भ के अनुसार होनी चाहिए, जब तक कि संदर्भ अन्यथा न बताए.
इस पर CJI ने कहा कि आपका कहना है कि लोक सेवक वह व्यक्ति है जो उस समय प्रभुत्वशाली स्थिति में होता है. यानी जब कोई विधायक से मदद के लिए आता है, तो किया गया कृत्य प्रभुत्वशाली स्थिति में होता है और ऐसा कोई भी कृत्य गंभीर अपराध माना जाएगा. यही आपका तर्क है? फिर सीजेआई ने कहा कि क्या लोक सेवक की परिभाषा को सख्ती से कानून के अनुसार देखना आवश्यक है या फिर उसे ऐसे व्यक्ति के रूप में भी देखा जा सकता है जिसकी समाज में प्रभुत्वशाली स्थिति हो? इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि लोक सेवक की अवधारणा लागू होती है. उन्होंने इस संदर्भ में एआर अंतुले मामले का हवाला दिया गया, जिसमें लोक सेवक की परिभाषा और उसके अनुप्रयोग पर विचार किया गया था.

 

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