महाराष्ट्र निकाय चुनाव अजीब मोड़ पर खड़े हैं. कुछ नेता जीतकर भी हार जाएंगे क्योंकि कई सीटों की किस्मत अब मतपेटी नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट तय करेगा. 50% से ज़्यादा आरक्षण वाली सीटों पर नतीजे सिर्फ कागज पर होंगे, असली फैसला रिट पिटीशन के बाद ही मिलेगा. लोकतंत्र का खेल अभी आधा तय, आधा अधूरा है.

1. 50% से ज्यादा आरक्षण वाले निकायों को नया नोटिफिकेशन रोकने का आदेश
जहां अधिसूचना बाकी है, वहां 50% से ऊपर आरक्षण लागू नहीं होगा.
2. पहले से अधिसूचित निकायों में चुनाव तय समय पर
लेकिन नतीजे रिट पिटीशन के फैसले से प्रभावित होंगे.
3. दो महानगरपालिकाओं पर भी यही नियम
वहां भी अल्टीमेट परिणाम अदालत की अगली सुनवाई पर निर्भर होंगे.
4. मामला बड़ी बेंच को रेफर
तीन जजों की बेंच 21 जनवरी को आगे की सुनवाई करेगी.
सुनवाई के दौरान आयोग ने कहा कि राज्य में केवल दो महानगरपालिकाओं में आरक्षण 50% पार कर सकता है. इस पर CJI ने गहरी टिप्पणी करते हुए कहा
हम जो भी करते हैं, समाज को जाति की रेखाओं में नहीं बांटना चाहिए.
राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक—
• 246 नगर परिषदें और 42 नगर पंचायतों में चुनावी प्रक्रिया शुरू है, मतदान 2 दिसंबर को होगा.
• इनमें से 40 नगर परिषद और 17 नगर पंचायत ऐसी हैं, जहां आरक्षण 50% से ऊपर है.
• वहीं 29 नगर परिषद, 32 जिला परिषद और 346 पंचायत समितियां ऐसी हैं] जहां अभी अधिसूचना जारी नहीं हुई है.
अदालत के आदेश अब इन निकायों के चुनावी गणित को पूरी तरह नए ढंग से परिभाषित करेंगे.

महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनाव दिसंबर 2021 से OBC आरक्षण विवाद में फंसे हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने तब कहा था कि आरक्षण तभी लागू होगा जब ‘ट्रिपल-टेस्ट’ पूरा किया जाए. मार्च 2022 में बनी बंठिया कमीशन की रिपोर्ट जुलाई 2022 में आई, जिसने डेटा उपलब्ध कराया. मई 2025 में कोर्ट ने 50% सीमा के भीतर रहते हुए चुनाव कराने का निर्देश दिया, लेकिन पिछले हफ्ते कोर्ट ने राज्य सरकार को यह कहते हुए झटका दिया कि उसने आदेश का गलत अर्थ निकाल लिया. कहीं भी आरक्षण 50% से अधिक नहीं हो सकता.
अब 2 दिसंबर के चुनाव समय पर होंगे, पर जिन सीटों पर आरक्षण सीमा टूटी है वहां जीत भी अधर में लटकी रहेगी. हो सकता है—
कुछ उम्मीदवार जीतकर भी हार जाएँ,
कुछ हारकर भी इंतजार में रहें,
और कुछ सीटों का भाग्य सिर्फ अदालत की अगली सुनवाई लिखे.
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने खेल का मैदान साफ कर दिया है.




