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‘न्यायिक व्यवस्था होगी प्रभावित’, कोर्ट ने अपने फैसलों को पलटने की प्रवृत्ति पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसलों को पलटने या पुनर्विचार के लिए खोलने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि इससे न्याय व्यवस्था की स्थिरता और अनुच्छेद 141 की भावना कमजोर होगी। यह टिप्पणी अनीसुर रहमान की जमानत शर्तों में ढील की मांग खारिज करते हुए आई।

 

, नई दिल्ली

 

सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसलों को बार-बार पलटने या पुनर्विचार के लिए खोले जाने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि यदि यह सिलसिला जारी रहा तो न सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया की स्थिरता प्रभावित होगी बल्कि संविधान के अनुच्छेद 141 की मूल भावना भी कमजोर पड़ेगी। यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देश का अंतिम कानून माना जाता है और सभी अदालतों पर बाध्यकारी होता है। अदालत ने इसे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का हर निर्णय किसी विवाद का अंत करता है और आगे आने वाले मामलों के लिए कानूनी दिशा तय करता है। लेकिन यदि बाद की पीठें सिर्फ वैकल्पिक दृष्टिकोण के आधार पर पुराने फैसलों को खोलने लगेंगी तो कानून की निश्चितता समाप्त हो जाएगी। अदालत ने कहा कि इससे संस्थागत प्रामाणिकता पर सीधा असर होगा और जनता के मन में सर्वोच्च न्यायालय की स्थिरता को लेकर भ्रम पैदा होगा।

 

न्याय व्यवस्था पर भरोसा घटने की आशंका
पीठ ने स्पष्ट किया कि न्याय व्यवस्था भरोसे पर चलती है और फैसलों की स्थिरता इसी भरोसे को मजबूत करती है। यदि पक्षकार बार-बार नई पीठ या विशेष संरचना की मांग करते रहेंगे, तो यह संकेत जाएगा कि सर्वोच्च अदालत का अंतिम निर्णय भी बदल सकता है। अदालत ने इसे अधिकार और विश्वसनीयता को कमजोर करने वाला रुझान बताया। कई महत्वपूर्ण मामलों में हाल के समय में पुनर्विचार की मांगें बढ़ने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

 

अनीसुर रहमान केस में आया मत
अदालत का यह कठोर दृष्टिकोण मोहम्मद अनीसुर रहमान की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया। रहमान ने अपनी जमानत की शर्तों में ढील मांगते हुए कहा था कि उसे कोलकाता से बाहर अपने जिला पूर्वी मेदिनीपुर जाने की अनुमति दी जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी। उस पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या का आरोप है और इस वर्ष जनवरी में उसे इस शर्त के साथ जमानत मिली थी कि वह कोलकाता में ही रहेगा।

पहले भी खारिज हुई थी मांग
रहमान ने यह दलील दी थी कि यात्रा प्रतिबंध उसके अनुच्छेद 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता अधिकार के खिलाफ है, लेकिन मई में भी उसकी यह मांग खारिज हो चुकी थी। अदालत ने कहा कि कई गवाह पहले ही मुकर चुके हैं और राज्य ने अभियोजन वापस लेने की भी कोशिश की थी। ऐसे में यदि उसे बाहर जाने दिया गया तो जमानत की शर्तें प्रभावहीन हो जाएंगी और जांच व सुनवाई प्रभावित हो सकती है।

पूर्व आदेश पलटने को न्याय के खिलाफ बताया
पीठ ने कहा कि यदि इस समय जमानत शर्तों में ढील दी गई तो यह न सिर्फ पूर्व आदेश का उल्लंघन होगा बल्कि यह गलत संदेश भी जाएगा कि सर्वोच्च अदालत अपने ही आदेशों की स्थिरता का सम्मान नहीं करती। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायिक निर्णय केवल विवाद हल करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि न्याय व्यवस्था की स्थिरता और संस्थागत सम्मान की नींव होते हैं। इसलिए फैसलों को बार-बार चुनौती देकर उन्हें पलटने का प्रयास न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

 

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