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राष्ट्रपति के वो 14 सवाल, जिसने सुप्रीम कोर्ट में छेड़ी ‘संविधान मंथन’… 5 जजों ने राज्यपाल की शक्तियों पर क्या दिया जवाब?

राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 143 के तहत भेजे गए 14 संवैधानिक सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने विस्तृत जवाब दिए. कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान स्वदेशी मॉडल पर आधारित है और राज्यपाल की शक्तियों, न्यायिक समीक्षा, राष्ट्रपति की भूमिका और विधेयक प्रक्रिया पर स्पष्ट दिशानिर्देश तय किए. पढ़ें वो 14 सवाल और क्या है उसका जवाब.

देश के राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगने का मामला बेहद दुर्लभ होता है. लेकिन इस बार राष्ट्रपति ने एक साथ 14 बड़े संवैधानिक सवाल भेजे. ऐसे सवाल जो राज्यपाल की भूमिका, राष्ट्रपति की मंजूरी, कानून बनाने की प्रक्रिया और न्यायिक समीक्षा जैसे मुद्दों की जड़ तक जा पहुंचे. इन सवालों ने भारतीय लोकतंत्र में काम करने वाले संवैधानिक तंत्र का बड़ा ‘मंथन’ छेड़ दिया.

इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने CJI बी.आर. गवई की अगुवाई में पांच जजों की संविधान पीठ गठित की. पीठ ने साफ कहा कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था “पूरी तरह स्वदेशी” है-न ब्रिटिश मॉडल जैसी, न अमेरिकी. यह एक ऐसा लिखित संविधान है जो 75 से ज्यादा वर्षों में लगातार विकसित हुआ है, और अपनी कॉलोनियल विरासत को धीरे-धीरे पीछे छोड़ रहा है. आइए, अब एक-एक करके देखें कि सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के इन 14 सवालों का क्या जवाब दिया.

 

  • 1. राज्यपाल के पास अनुच्छेद 200 के तहत क्या विकल्प होते हैं? 

    पीठ ने कहा कि विधानसभा से आया विधेयक मिलने पर राज्यपाल तीन काम कर सकते हैं-उसे मंजूरी देना, रोकना या राष्ट्रपति के पास भेजना. साथ ही पहला प्रावधान कहता है कि जरूरत पड़ने पर विधेयक को सदन में वापस भेजना भी अनिवार्य है. लेकिन राज्यपाल के पास इसे अनिश्चित समय तक ‘लंबित’ रखने का कोई चौथा विकल्प नहीं है.
  • 2. क्या राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य हैं?
    संविधान पीठ के अनुसार, राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करते हैं. अनुच्छेद 200 उन्हें सीमित विवेक देता है. इसका उपयोग वे केवल विधेयक को वापस भेजने या राष्ट्रपति के लिए आरक्षित रखने के समय कर सकते हैं. “उनकी राय में” शब्दों का इस्तेमाल इसी विवेक की ओर संकेत करता है.
  • 3. क्या अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के विवेक की न्यायिक समीक्षा हो सकती है?
    कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के विवेक की न्यायिक समीक्षा सामान्य हालात में नहीं की जा सकती. अदालत उनके निर्णय की योग्यता या कारणों की जांच नहीं करेगी. हालांकि अगर राज्यपाल अत्यधिक लंबी अवधि तक निष्क्रिय रहें, तो न्यायालय सीमित दायरे में हस्तक्षेप करते हुए उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने का निर्देश दे सकता है.
  • 4. क्या अनुच्छेद 361 न्यायिक समीक्षा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाता है?
    पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 361 राज्यपाल को सुरक्षा देता है, लेकिन यह न्यायिक समीक्षा को पूरी तरह समाप्त नहीं करता. अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की “लंबी निष्क्रियता” जैसी स्थिति में समीक्षा का सीमित दायरा उपलब्ध रहता है.
  • 5, 6, 7. क्या अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल–राष्ट्रपति के फैसलों पर समयसीमा लगाई जा सकती है?
    इन तीन सवालों पर कोर्ट ने संयुक्त जवाब दिया. संविधान ने जानबूझकर अनुच्छेद 200 और 201 में कोई समय सीमा नहीं तय की है, ताकि संवैधानिक प्राधिकारियों को अपने निर्णयों में लचीलापन मिल सके. इसलिए अदालत खुद समयसीमा नहीं लगा सकती. राष्ट्रपति की मंजूरी भी न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है.
  • 8. क्या हर बार राष्ट्रपति को अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी होती है?
    संविधान पीठ ने कहा कि ऐसा कोई दायित्व नहीं है. राज्यपाल द्वारा भेजे गए हर विधेयक पर राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से सलाह लेने की बाध्यता नहीं है.
  • 9. क्या कानून बनने से पहले राज्यपाल–राष्ट्रपति के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है?
    कोर्ट ने स्पष्ट कहा, नहीं. कानून बनने से पहले की प्रक्रिया को चुनौती नहीं दी जा सकती. विधेयक को तब ही चुनौती दी जा सकती है, जब वह “कानून” के रूप में लागू हो जाए.
  • 10. क्या अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति या राज्यपाल के आदेशों को बदल सकता है?
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 अदालत को ऐसी शक्ति नहीं देता. न कोर्ट किसी आदेश को “प्रतिस्थापित” कर सकता है और न “मानी गई मंजूरी” (Deemed Assent) का सिद्धांत लागू कर सकता है.
  • 11. क्या राज्यपाल की मंजूरी के बिना विधेयक कानून बन सकता है?
    पीठ ने दो टूक कहा, नहीं. अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की मंजूरी के बिना कोई भी विधेयक कानून नहीं बन सकता. इस कार्यपालिका भूमिका को कोई दूसरी संवैधानिक अथॉरिटी बदल नहीं सकती.
  • 12. क्या हर बार किसी बड़े संवैधानिक सवाल पर बड़ी पीठ बनाना जरूरी है?
    कोर्ट ने यह सवाल वापस कर दिया, क्योंकि यह राष्ट्रपति द्वारा भेजे गए संदर्भ के स्वरूप से संबंधित नहीं था.
  • 13. क्या अनुच्छेद 142 की शक्तियां केवल प्रक्रियागत मामलों तक सीमित हैं?
    पीठ ने कहा इसका जवाब पहले से ही सवाल 10 में दिया जा चुका है.
  • 14. क्या अनुच्छेद 131 केंद्र–राज्य विवादों पर सुप्रीम कोर्ट की अतिरिक्त शक्तियों को सीमित कर देता है?
    कोर्ट ने इसे “निरर्थक” करार दिया, यानी संदर्भ से असंबंधित माना.

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