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मोदी उनके मंत्रीओ की मणिपुर त्रासदी में मरहम की बजाये सियासत ?

इस मायने में देश की राजनीति का यह स्वरूप वाकई दुखद और निराशाजनक है जिसमें केन्द्र का सत्तारुढ़ दल और सरकार की किसी त्रासदी में पीड़ित लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाये सियासत करने में अधिक रुचि है

इस मायने में देश की राजनीति का यह स्वरूप वाकई दुखद और निराशाजनक है जिसमें केन्द्र का सत्तारुढ़ दल और सरकार की किसी त्रासदी में पीड़ित लोगों के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाये सियासत करने में अधिक रुचि है। पिछले कुछ वर्षों के दौरान आई हर तरह की आपदाओं, त्रासदियों व संकटों के बहाने सामाजिक ध्रुवीकरण करने और वोट बैंक साधने के जो प्रयोग हो रहे हैं वे इसलिये निन्दनीय हैं क्योंकि इसके कारण तकलीफ़ में पड़े लोगों के दुख-दर्द तो दूर होने से रहे, उलटे सामाजिक विभाजन की प्रक्रिया तेज़ हो रही है और परस्पर वैमनस्यता बढ़ती जा रही है। साम्प्रदायिक टकराव में जल रहे उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर के मामले में यही हो रहा है। अनेक गलतियां करने के बाद भी केन्द्र के साथ वहां राज्य में भी सरकार चलाने वाली भारतीय जनता पार्टी इसे अब भी एक राजनैतिक मुद्दा ही बनाये हुए है।

म्यांमार जैसे देश से लगी सीमा पर स्थित होने के कारण मणिपुर के घटनाक्रम की संवेदनशीलता को केन्द्र व राज्य की सरकारें तथा भाजपा दोनों ही जैसे समझना भी नहीं चाहतीं- ऐसे वक्त में भी जब इसकी आग अन्य पड़ोसी राज्यों में लगातार फैल रही है। अब तो पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे ने इस हिंसा के पीछे चीन का हाथ होने का संदेह व्यक्त किया है तथा पीड़ित कुकी समुदाय अपना अलग प्रशासन मांगने लग गये हैं। तब भी। तीन महीनों से यहां जारी हिंसा को ढंककर रखने वाली केन्द्र सरकार की नींद मानों तब जाकर खुली जब दो महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाए जाने से व्यथित सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया और चेतावनी दी कि अगर सरकार कुछ नहीं करती तो वह खुद कार्रवाई करेगी।

रूस-यूक्रेन का युद्ध और फ्रांस की हिंसा को भी रोक सकने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसके बाद ही हरकत में आये पर संसद के भीतर नहीं वरन बाहर आकर मणिपुर पर बोले; वह भी कुल जमा 36 सेकंड ही, जबकि संसद उनके बयान के इंतज़ार में ठप पड़ी है और उनके खिलाफ लाया अविश्वास प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की टेबल पर अटका हुआ है।

संसद में इस भीषण घटना पर बयान देने से बचने-बचाने का नाटक पिछले डेढ़ हफ्ते से जारी है। प्रधानमंत्री लोकसभा में आकर इस पर बयान दें, इस मांग को लेकर सम्पूर्ण विपक्ष अड़ा हुआ है और सत्तारुढ़ दल अपने पीएम को छिपाती फिर रही है। ऐसे समय में जब सत्ता पक्ष को मणिपुर में लोगों के साथ खड़े होना था, उसकी जगह पर हाल ही में बने संयुक्त विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूज़िव एलाएंस) के 21 सदस्यों ने शनिवार-रविवार को यहां आकर लोगों से बात की। यह दल जमीनी हकीकत से सरकार व संसद को एक रिपोर्ट के जरिये अवगत करायेगा एवं शांति बहाली के उपाय सुझाएगा।

बहरहाल, जिन मोदी जी ने मणिपुर की घटना पर संसद के बाहर अपनी तीव्र पीड़ा व क्रोध को दर्शाया है, वह इसलिये वास्तविक नहीं लगता क्योंकि अगर वे सचमुच पीड़ा से भर गये होते तो मणिपुर के प्रभावितों को गले लगाते और वाकई क्रोधित रहते तो दोषियों को दण्डित करते। दुनिया भर में इसे लेकर भारत की पिट रही भद्द से निर्लिप्त मोदी राजस्थान के सीकर में भव्य मंच सजाकर व भीड़ जुटाकर विपक्षी गठबन्धन को आतंकवादी संगठनों से जोड़ रहे हैं तो उनके खासमखास व घटना के लिये उतने ही उत्तरदायी गृहमंत्री मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ में चुनावी तैयारियां कर रहे हैं। शाह जी अल्पावधि में तीन बार मध्यप्रदेश का दौरा कर चुके हैं लेकिन दोनों के पास इतना समय नहीं है कि मणिपुर जाकर लोगों को दिलासा दें या शांति बहाली करें।

आसन्न चुनावों के मद्देनज़र व आगामी वर्ष के लोकसभा के लिहाज से मुद्दों के लिये जूझती भाजपा मणिपुर के मुद्दे को संजीवनी बना रही है। बहुसंख्यक मैतेइयों के अल्पसंख्यक कुकी लोगों पर होते अत्याचार से मोदी-शाह को इसलिये पिघलने की आवश्यकता महसूस नहीं होती क्योंकि इसका सियासती फायदा वे और उनकी पार्टी आपदा में अवसर की तरह तलाश रही है।

समय सियासत करने का नहीं है वरन भीतर तक लगे घावों पर मरहम लगाने का है। राहुल गांधी तो पहले ही जाकर आ गये और अब जबकि प्रतिपक्ष वहां लोगों की बातें सुन रहा है व रिपोर्ट पेश करने जा रहा है, केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने इस संवेदनशील मामले में सियासत का तड़का लगाते हुए कहा है कि ‘क्या वे (विपक्षी सांसद) राजस्थान का भी दौरा करेंगे।’ दरअसल ठाकुर उसी नैरेटिव को आगे बढ़ा रहे हैं जिसके अंतर्गत अपने अति संक्षिप्त बयान में मोदी इस घटना की तुलना राजस्थान, छत्तीसगढ़ व पश्चिम बंगाल से करते हुए अपनी संकीर्ण सोच को पहले ही प्रदर्शित कर चुके हैं। यह तो सच है कि इन राज्यों में भाजपा की सरकारें नहीं हैं परन्तु यह भी हर कोई जानता है कि वहां की स्थिति ऐसी बिलकुल नहीं है कि उनकी तुलना मणिपुर की घटनाओं से की जाये। हालांकि भाजपा को किसी ने रोका नहीं है कि वह इन राज्यों की उन घटनाओं पर न बोले जिनकी ओर मोदी-भाजपा का इशारा है। एक केन्द्रीय मंत्री को इस गैर जिम्मेदार बयान के लिये इसलिये कुछ कहा जाना बेकार है क्योंकि उनकी पार्टी के मुखिया व उनकी सरकार के प्रमुख भी विपक्ष को बदनाम करने के इसी एजेंडे पर चलते हैं। वे तो केवल अनुसरण कर रहे हैं।

जो भी हो, सामुदायिक हिंसा व परस्पर घृणा में जल रहे मणिपुर में लोगों के •ाख्मों पर मरहम लगाने के विपक्ष के प्रयासों में सहयोग की बजाये भाजपा और उसके नेताओं द्वारा राजनीति करना बेहद शर्मनाक है।

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