धर्म

जानिए महिलाओं की कुंडली के बारे में कुछ तथ्य

वैदिक ज्योतिष में किसी जातक की जन्मकुंडली का फल कथन करते समय उसके स्त्री-पुरुष होने का विचार अवश्य कर लेना चाहिए। ग्रह समान होते हुए कई बार स्त्री और पुरुषों के लिए उसके फल अलग-अलग हो जाते हैं। आइए जानते हैं कुछ सामान्य नियम जिनसे स्पष्ट हो जाता है किकिसी स्त्री की कुंडली में मौजूद ग्रह उस पर किस तरह प्रभाव डालते हैं।

पति के बारे में..

जिस स्त्री की कुंडली में लग्न चर राशि का हो उसका पति हमेशा विदेश यात्राएं करता रहता है या वह दूसरे देशों में रहता है।
स्त्री की कुंडली में सातवें भाव में शनि हो और कोई पापी ग्रह की उस पर दृष्टि हो तो विवाह में बहुत बाधाएं आती हैं।
स्त्री की कुंडली में बुध और शनि सातवें भाव में हो तो पति संतान उत्पन्न करने में असमर्थ होता है।
स्त्री की कुंडली के आठवें भाव में बैठा शनि उसके पति के लिए अनिष्टकारी होता है।
बुध और शुक्र स्त्री की कुंडली में लग्न में हो तो पति बहुत प्रेम करने वाला मिलता है।
सप्तम भाव में अशुभ ग्रह हों तो पति क्रूर, निर्धन और चालाक किस्म का मिलता है।
सप्तम भाव में शुभ ग्रह हो तो सुंदर, विवेकी, उच्च शिक्षित पति मिलता है।
सातवें भाव में शनि और सूर्य हो तो उसका पति छोड़कर चला जाता है।

वैधव्य योग के बारे में..

किसी स्त्री की जन्मकुंडली में यदि सप्तम मंगल हो और अन्य पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो वह शीघ्र विधवा हो जाती है।
सप्तमेश अष्टम में हो और अष्टमेश सप्तम में हो तो विवाह के कुछ ही महीनों में पति की मृत्यु हो जाती है।
आठवें भाव में कोई पाप ग्रह शत्रु राशि में बैठा हो और उस ग्रह की महादशा चल रही हो तो विधवा हो जाती है।
लग्न और सप्तम में पाप ग्रह होने पर विवाह के सात वर्ष बाद पति की मृत्यु का योग बनता है।
यदि अशुभ ग्रह अपनी नीच राशि में या शत्रु राशि में दूसरे, सातवें या आठवें भाव में हो तो पति की मृत्यु पहले हो जाती है।
स्त्री की कुंडली में अष्टम भाव का सूर्य पति की असामयिक मृत्यु बताता है।

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