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मोदी शाशन में आपदा में अवसर का घिनौना उदाहरण देश देख रहा है,क्या यही हैं अच्छे दिन !

कुछ दिनों पहले संघ के मुखपत्र माने जाने वाले पांचजन्य में प्रकाशित एक लेख में कहा गया था

कुछ दिनों पहले संघ के मुखपत्र माने जाने वाले पांचजन्य में प्रकाशित एक लेख में कहा गया था कि इन्फ़ोसिस द्वारा विकसित जीएसटी और आयकर रिटर्न वेबसाइटों में गड़बड़ियों के कारण, ‘देश की अर्थव्यवस्था में करदाताओं के विश्वास को चोट लगी है। क्या इन्फ़ोसिस के माध्यम से राष्ट्रविरोधी ताकतें भारत के आर्थिक हितों को ठेस पहुंचाने की कोशिश कर रही हैं?’ पता नहीं इन पंक्तियों के लेखक को यह ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ कि इन्फोसिस जैसी बड़ी कंपनी को राष्ट्रविरोधी ताकतें इस्तेमाल कर रही हैं और ये कौन लोग हैं जिन्हें राष्ट्रविरोधी कहा जा रहा है।

किसी वेबसाइट में गड़बड़ी को सीधे राष्ट्रविरोध से जोड़ लेना भी राष्ट्रवाद के पंडितों को ही आता होगा, बाकी जनता तो रोज कमाने-खाने और अपने हिस्से की कर अदायगी से ही राष्ट्रप्रेम निभा रही है। बहरहाल, इस लेख पर पांचजन्य की खूब खिंचाई भी हुई, क्योंकि इसमें अकारण एक कंपनी को निशाना बनाया गया था। संघ ने पांचजन्य को अपनी पत्रिका मानने से भी इंकार कर दिया था। अब देश के पूर्व आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन ने इस लेख पर कुछ सवाल उठाए हैं।

इन्फोसिस विवाद पर रघुराम राजन ने कहा कि मुझे लगता है कि यह एकदम बेकार की बात है। क्या आप सरकार पर देशद्रोह का आरोप लगाएंगे क्योंकि टीकाकरण में इसने अच्छा काम नहीं किया? आप कहेंगे कि ग़लती हो गई और इन्सान से ग़लती होती है। श्री राजन ने जीडीपी वृद्धि के दावों पर भी कहा कि कारखाना उत्पादन में हुई वृद्धि को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए क्योंकि इसका आकलन बहुत ही निचले आधार पर किया गया था और जो वृद्धि दिख रही है, वह भी स्वाभाविक नहीं है। उन्होंने कहा, ‘क्या यह वृद्धि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए है या अर्थव्यवस्था के किसी एक क्षेत्र के लिए है?’ रघुराम राजन के इन सवालों का जवाब देने के लिए सरकार के कौन से मंत्रियों को आगे किया जाता है और वो अपने तरकश से कौन से तर्क-कुतर्क निकालते हैं, ये तो वक्त बताएगा। फिलहाल अर्थव्यवस्था के क्षेत्र से दो ऐसी खबरें आई हैं, जिन पर सरकार को जवाब देना चाहिए।

पहली खबर महंगाई दर की है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अगस्त के महीने में देश का थोक मूल्य सूचकांक बढ़कर 11.39 प्रतिशत पर जा पहुंचा है। थोक मूल्य सूचकांक का मतलब उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है। यह लगातार पांचवां महीना है जब थोक मूल्य सूचकांक दो अंकों में है। यानी महंगाई लगातार बढ़ रही है। गैर खाद्य वस्तुओं, पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी, प्राकृतिक गैस, धातुओं, खाद्य उत्पादों, कपड़े, रसायनों और रासायनिक उत्पादों के दाम बढ़ने को थोक महंगाई बढ़ने का प्रमुख कारण बताया गया है।

लेकिन इस तरह के कारण गिनाना वैसा ही है, जैसे किसी के मरने के पीछे कभी बीमारी, कभी दुर्घटना को जिम्मेदार ठहराया जाता है, तो कभी भगवान की इच्छा को। लेकिन सच यही होता है कि जो कुछ हुआ है, उसके पीछे कोई न कोई कारण होता जरूर है और महज इन कारणों को गिनाकर अपनी जिम्मेदारी से बरी नहीं हुआ जा सकता। जैसा इस वक्त सरकार कर रही है। महामारी के दौरान बिजली, कोयला, पेट्रोलियम व गैस और सीमेंट खनन जैसे तमाम क्षेत्रों में उत्पादन प्रभावित हुआ और इसका सीधा असर उद्योगों पर पड़ा। मांग और आपूर्ति का चक्र अपनी धुरी से हिल गया। छोटे और मंझोले कारोबार खत्म होने की कगार पर आ गए। इन सबसे अर्थव्यवस्था धराशायी हो गई। लेकिन ये हालात दुनिया के बाकी देशों में भी थे।

लेकिन कई सरकारों ने कारोबारियों को असल के राहत पैकेज दिए, बेरोजगारों और नौकरी से निकाल दिए गए लोगों को नकदी मदद की, जबकि भारत में सरकार किश्तों में राहत पैकेज की घोषणा कर सुखद भविष्य के सपने दिखाती रही। अब वर्तमान की जो सूरत नजर आ रही है, उसका सामना आम आदमी को ही करना पड़ रहा है। थोक महंगाई दर बढ़ने का मतलब आने वाले समय में महंगाई और बढ़ेगी। खाद्य तेल, दुग्ध उत्पाद, मांस-अंडे, सब्जी-फल, दवा, कपड़े हरेक चीज महंगी होगी। सरकार चाहती तो इस स्थिति को आने से रोक सकती थी, लेकिन सरकार का ध्यान पेट्रोल-डीजल महंगा करके अपना खजाना भरने और सार्वजनिक उद्योगों को निजी हाथों में बेचने पर लगा हुआ है।

दूसरी खबर नेशनल सैंपल सर्वे के एक अध्ययन से सामने आई है। जनवरी 2019 में किए गए इस अध्ययन से पता चला है कि सबसे धनी 10 प्रतिशत लोगों के पास देश की कुल संपदा का 50 प्रतिशत है, दूसरी ओर सबसे ग़रीब 50 प्रतिशत लोगों के पास सिर्फ 10 प्रतिशत जायदाद है। यानी देश में अमीर और ग़रीब के बीच की खाई पहले से अधिक चौड़ी हो गई है। आपको बता दें कि इस अध्ययन में व्यक्ति की जायदाद की एक मौद्रिक कीमत आंकी गई, जिसमें उसका घर, ज़मीन, मकान, घर की चीजें, जानवर समेत समेत तमाम चीजों की कीमत निकाली गई। इसमें बैंक व दूसरी जगहों पर जमा पैसे भी जोड़े गए। अध्ययन से पता चला कि शहरों में कुल मिला कर 274.6 लाख करोड़ रुपए की जायदाद है। इसमें से 130.6 लाख करोड़ रुपए सिर्फ संपन्न 10 प्रतिशत लोगों के पास है। जबकि गांवों में 238.1 लाख करोड़ रुपए की कुल जायदाद है, जिसमें से 132.5 लाख करोड़ रुपए 10 प्रतिशत धनी लोगों के पास है। गांवों में सबसे ग़रीब 50 प्रतिशत लोगों के पास 10.2 प्रतिशत जायदाद है जबकि शहरों में इससे भी कम यानी 6.2 प्रतिशत जायदाद है।

गौरतलब है कि ये अध्ययन कोरोना की चपेट में आने से पहले का है। अभी अगर नए सिरे से लोगों की जायदाद का आकलन किया जाएगा, तो देश की और भयावह तस्वीर सामने आ सकती है। क्योंकि इस दौरान गरीबी की श्रेणी में बहुत से लोग आए, जबकि इसी दौरान चंद उद्योगपतियों की दौलत में बेशुमार इजाफा हुआ। आपदा में अवसर का घिनौना उदाहरण देश देख रहा है, और जनता महंगाई की मार चुपचाप सह रही है। क्या सरकार इसी को अच्छे दिन कहती है।

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