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शिक्षा से खौफज़दा केंद्र की मोदी सरकार ?

21वीं सदी में इससे अधिक कुछ भी हास्यास्पद और दुखद एक साथ नहीं हो सकता कि किसी को यह कहने के लिये नौकरी से निकाल दिया जाये कि ‘शिक्षित जनप्रतिनिधियों को वोट देना चाहिये

21वीं सदी में इससे अधिक कुछ भी हास्यास्पद और दुखद एक साथ नहीं हो सकता कि किसी को यह कहने के लिये नौकरी से निकाल दिया जाये कि ‘शिक्षित जनप्रतिनिधियों को वोट देना चाहिये।’ ओपन प्लेटफॉर्म पर कार्यरत एडटेक कंपनी अनएकेडमी ने अपने उस टीचर को बर्खास्त कर दिया है, जिसने अपनी एक क्लास के दौरान चुनावों में पढ़े-लिखे उम्मीदवारों को वोट देने की सलाह दी थी।

करण सांगवान नामक इस टीचर को बर्खास्त करने की पुष्टि करते हुए अनएकेडमी के को-फाउंडर रोमन सैनी ने ट्वीट कर लिखा कि ‘सांगवान ने कंपनी की आचार संहिता को तोड़ा है इसलिए उन्हें हटाना पड़ा है।’ माना जाता है कि सांगवान को केन्द्र सरकार की कथित नाराजगी के बाद नौकरी से हटाया गया है। अपने वीडियो में पढ़े-लिखे नेताओं को वोट देने की अपील के बाद करण सांगवान सोशल मीडिया के सभी माध्यमों पर जबर्दस्त ट्रेंड करने लगे थे।

वैसे तो शिक्षित व्यक्ति को वोट देने की अपील से किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये क्योंकि इसमें तो कोई शक ही नहीं कि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाये तो अशिक्षित व्यक्ति के मुकाबले पढ़ा-लिखा व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में समाज के लिये उपयोगी होता है। वैसे सांगवान का मामला यह साबित करने के लिये पर्याप्त है कि वर्तमान सरकार ने एक ऐसे भारत का निर्माण कर दिया है जिसमें साक्षरता को अवगुण की तरह लिया जा रहा है जबकि दुनिया भर में उच्च शिक्षा के प्रति रुझान बढ़ रहा है। देश में बढ़ती विवेकहीनता, अतार्कि कता और अवैज्ञानिकता का कारण इस अकेले दृष्टांत से भी समझा जा सकता है।

सांगवान की बर्खास्तगी का कारण इसलिये सरकार की नाराजगी को माना जा रहा है क्योंकि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता पर अक्सर सवाल उठते हैं। भारतीय जनता पार्टी के कुछ और भी नेता व मंत्री भी ऐसे हैं जिनकी शैक्षणिक योग्यता पर संदेह व्यक्त किया जाता है। सांगवान की बर्खास्तगी राजनैतिक व सामाजिक हलकों में मज़ाक का विषय बन गया है। लोगों को लग रहा है कि सांगवान की विद्यार्थियों को दी गई सलाह इसलिये भाजपा को बुरी लग गई क्योंकि उसे लगता है कि यह उसके ही खिलाफ कहा गया है।

कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने तो बाकायदे प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर कहा कि ‘आखिर यह बात (सांगवान की) सिर्फ भाजपा को ही क्यों बुरी लगी जबकि अन्य किसी को भी इससे आपत्ति नहीं हुई।’ आपत्ति का कोई कारण भी नहीं बनता क्योंकि स्वस्थ व मजबूत लोकतंत्र का आधार ही गुणवत्तापूर्ण जनप्रतिनिधियों का चुनाव है।

कार्टून तो इस आशय के भी तैर रहे हैं कि ‘आज पढ़े-लिखों को चुनने की बात हो रही है। कल को यदि ईमानदार लोगों को चुनने की मांग होने लगे तो मुश्किल हो जायेगी।’ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी सांगवान की बात को जायज बतलाया है। इसे कोई गलत कह भी नहीं सकता। सम्भवत: इस सरकार के द्वारा जिस प्रकार से विश्वविद्यालयों ही नहीं समस्त तरह की शिक्षाओं, विवेक और ज्ञान के खिलाफ वातावरण बनाया गया है यह उसी का परिणाम कहा जा सकता है। पिछले कुछ समय से बताया जा रहा है कि पढ़ना-लिखना व्यर्थ है।

समाज का काम इसके बिना भी बखूबी चल सकता है। ऐसी अवधारणा विकसित करने का फायदा यह होता है कि सरकार शिक्षा के विकास पर मेहनत और खर्च करने से बच जाती है। शिक्षा को एक अनुपयोगी काम बतला देने से सरकार और गैर अलोकतांत्रिक व निरंकुश राजनैतिक दलों-नेताओं को कई लाभ होते हैं। सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि अशिक्षित लोगों की भीड़ निर्मित कर उन्हें मनचाही दिशा में हांका जा सकता है और किसी भी तरह के विचारों से उन्हें बरगलाया जा सकता है। आज सड़कों पर हिंसा व नफ़रत से भरे नौजवानों के जो हुजूम देखे जा रहे हैं वे शिक्षा से विरक्त जनसमुदाय ही हैं। यह दीगर बात है कि शिक्षा को व्यर्थ बतलाने वाले नेता स्वयं अपने बच्चों को खूब पढ़ाने-लिखाने में रुचि रखते हैं। उनके बच्चे देश-विदेश के अच्छे संस्थानों से पढ़-लिखकर निकलते हैं।

जनप्रतिनिधियों का पढ़ा-लिखा होना बेमतलब साबित करने वाले माहौल में ही योग्य नेताओं (जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह तक) के बारे में यह कहना लोगों को प्रभावित करता है कि उच्च शिक्षण का कोई फायदा नहीं है। ‘हार्वर्ड बनाम हार्ड वर्क’ का यह सिद्धांत दिया जाता है कि देश का भला उच्च शिक्षा से नहीं वरन कड़ी मेहनत से होगा। यह अलग बात है कि गुणवत्तापूर्ण अध्ययन के लिये विख्यात संस्थानों में दाखिला लेना और उनमें विद्यार्जन करना किसी भी तरह से कम मेहनत का काम नहीं है। दूसरी तरफ, आज के वातावरण में अकेली मेहनत काम की नहीं जब तक कि व्यक्ति कुशाग्र बुद्धि व शिक्षित न हो।

सांगवान से मोदी सरकार की नाराज़गी का कारण यही हो सकता है कि उन्हीं के कार्यकाल के दौरान भारतीय समाज में ज्ञान का तिरस्कार और उसके प्रति घृणा फैलाने का काम हुआ है। देश के अच्छे विश्वविद्यालयों पर बमबारी करने की सलाह देना, वहां के स्वतंत्र चेता व सरकार विरोधी छात्रों को टुकड़े-टुकड़े गैंग बतलाकर उन्हें देश विरोधियों की शरणस्थली बतलाना आदि इसी वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है। अज्ञानता और विवेकहीनता पर गर्व की भावना शिक्षा के प्रति गहन अरुचि का परिणाम है जो थाली-ताली पीटने को महामारी उन्मूलन का उपाय मानने और देश की आजादी को 99 वर्षों की लीज़ पर बतलाने में संकोच नहीं करती। बाकी, विश्व गुरु बनने की चाहत तो अपनी जगह पर बनी हुई है ही।

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